मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि इस्लाम धर्म अपनाने के बाद व्यक्ति पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का मुसलमान होने का दावा नहीं कर सकता। साथ ही कोर्ट ने ऐसे मामलों में आरक्षण देने वाले तमिलनाडु सरकार के 2024 के आदेश को असंवैधानिक घोषित कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि कुछ संप्रदायों को पिछड़ा और बाकी को उभरता कहना कुरान के आदेशों के विपरीत है।

आदेश को रखा बरकरार

जस्टिस जी आर स्वामीनाथन और पीबी बालाजी की बेंच ने एक व्यक्ति के मुस्लिम लेब्बाई प्रमाण पत्र जारी करने के आवेदन को रिजेक्ट करने वाले आदेश को बरकरार रखा। साथ ही याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा, “हम मानते हैं कि इस्लाम धर्म अपनाने वाला व्यक्ति पिछड़े वर्ग के मुस्लिम का दर्जा हासिल करने का दावा नहीं कर सका। वे केवल एक मुस्लिम है और बस इतना ही।”

मद्रास हाईकोर्ट ने 25 जून के अपने आदेश में कहा कि किसी हिंदू व्यक्ति का इस्लाम अपनाना भारत के संविधान के आर्टिकल 25 के तहत उसके मौलिक अधिकार का प्रयोग माना जा सकता है, लेकिन जब इस तरह के आरक्षण का लाभ लेने का दावा करता है तो इससे इस मांग की वैधता और कानूनी औचित्य पर एक और बहस छिड़ जाती है।

2016 में किया था निकाह

याचिकाकर्ता ने 2016 में इस्लामी रीति-रिवाजों के मुताबिक एक महिला से निकाह किया था और उनके दो बच्चे हैं। उन्होंने मुस्लिम लेब्बाई के रूप में अपना पहचान पत्र बनवाने के लिए आवेदन किया था क्योंकि उस विशेष समुदाय के धर्म का पालन करते हैं। उनका आवेदन कायथर के तहसीलदार की ओर खारिज कर दिया गया, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

अगड़ी समुदाय से इस्लाम अपनाने वाले व्यक्ति को बीसी का दर्जा मिलेगा- कोर्ट

आदेश में कहा गया, “उन्होंने बताया कि अगड़ी समुदाय से इस्लाम अपनाने वाले व्यक्ति को बीसी (मुस्लिम) का दर्जा मिलेगा। केवल वे लोग जो पहले से ही आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं, इस्लाम में धर्मांतरण के कारण अपना आरक्षण नहीं खोएंगे। इसलिए, उनके मुताबिक, सामाजिक संतुलन प्रभावित नहीं होगा।”

व्यक्ति ने आगे तर्क दिया कि इस्लाम में चिह्नित संप्रदाय विशिष्ट आस्था और रीति-रिवाजों का पालन करते हैं और यह संबंधित जमात का कर्तव्य है कि इस्लाम अपनाने वाले व्यक्ति को इनमें से किसी एक संप्रदाय में स्वीकार करे। आगे कहा कि एक बार जमात की ओर से प्रमाण पत्र जारी कर दिए जाने के बाद, राजस्व प्राधिकरण को उस सवाल उठाने का अधिकार नहीं है। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि कोर्ट द्वारा इसकी समीक्षा करना भी उचित नहीं होगा और बेंच से सरकारी आदेश को रद्द न करने का आग्रह किया।

संविधान भेदभाव को प्रतिबंधित करता है- कोर्ट

बेंच ने टिप्पणी की कि यद्यपि संविधान धर्म, जाति, नस्ल, संप्रदाय, जन्म स्थान आदि के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है, फिर भी राज्य को नागरिकों के किसी भी सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग या अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान करने का अधिकार है।

आदेश में आगे कहा, “आरक्षण नीतियां उपर्युक्त संवैधानिक आदेश के अनुपालन में हैं। चूंकि केवल धर्म के आधार पर आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता, इसलिए सरकार ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा पिछड़े वर्गों की एक लिस्ट भी बनाई है। इस मामले में हम केवल मुसलमानों के लिए पिछड़े के आरक्षण से संबंधित है। तमिलनाडु सरकार ने जानबूझकर और अगर हम कहें तो सही ही, इस्लाम धर्म मानने वाले सभी व्यक्तियों को पिछड़े वर्ग की श्रेणी में शामिल नहीं किया है।”

ईश्वर की नजर में सब बराबर- कोर्ट

इस फैसले में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि इस्लाम एक समतावादी समाज की स्थापना करना चाहता है। कोर्ट ने कहा, “ईश्वर की नजर में सब बराबर हैं। यहाँ कोई सामाजिक ऊँच-नीच नहीं है। फिर भी, ऐतिहासिक कारणों से इस्लामी समाज भी विभिन्न समुदायों में बँटा हुआ है। यहाँ तक कि यह भी कहा जा सकता है कि ये हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था के समान हैं। जिस प्रकार जाति का निर्धारण जन्म से होता है, उसी प्रकार कोई व्यक्ति जन्म से ही रौथर, मराक्कयार या दक्कनी मुसलमान होता है। यह कहना हास्यास्पद है कि कोई व्यक्ति रौथर मुसलमान बन सकता है।”

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कर्नाटक हाई कोर्ट ने गुरुवार को तय कानूनी नियमों का पालन किए बिना गैर-कानूनी गिरफ्तारियां करने वाले पुलिस अधिकारियों की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने सवाल किया कि क्या पुलिस को लगता है कि वर्दी होने का मतलब है कि वे कानून की परवाह किए बिना कुछ भी कर सकते हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें