Legal News: मद्रास उच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई करते हुए समाज और आज की युवा पीढ़ी की मानसिकता पर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि युवा पीढ़ी रिजेक्शन स्वीकार नहीं कर पाती है। कोर्ट साल 2016 में कॉलेज की क्लास के अंदर अपनी क्लासमेट की हत्या के मामले की सुनवाई कर रहा था। इसमें उसकी सजा और आजीवन कारावास को बरकरार रखा गया है।

मद्रास हाईकोर्ट ने इस बात पर दुख व्यक्त किया कि कैसे कुछ पुरुषों में ‘अस्वीकृति’ बर्दाश्त न कर पाने की सनक सवार हो जाती है। इसी वजह से 2016 में एक युवा और होनहार महिला को अपनी जान चली गई।

‘शिक्षित’ सहपाठियों की कायरता पर कोर्ट का कड़ा प्रहार

न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश और न्यायमूर्ति के. के. रामकृष्णन की पीठ ने फैसला सुनाते हुए उन गवाह छात्रों की भी कड़ी आलोचना की, जो मुकदमे के दौरान अदालत में अपने बयानों से मुकर गए थे। कोर्ट ने बेहद भारी मन से कहा कि आज की शिक्षा छात्रों में सही चरित्र का निर्माण करने में विफल रही है।

अदालत ने अपने 15 जून के आदेश में कड़े शब्दों में कहा, “यह बेहद निराशाजनक है कि जिन छात्रों ने इस खौफनाक घटना को अपनी आंखों के सामने घटते देखा, उन्होंने अदालत में आकर अपना बयान बदल दिया। हमें भारी मन से यह कहना पड़ रहा है कि इन छात्रों ने अभियोजन पक्ष का समर्थन न करके मृतक सहपाठी को निराश किया है और वे सत्य के साथ खड़े होने के अपने कर्तव्य में पूरी तरह विफल रहे।”

क्या था पूरा मामला?

अभियोजन पक्ष के अनुसार यह घटना सिविल इंजीनियरिंग के तीसरे वर्ष की है। आरोपी छात्र और मृतका एक ही क्लास में पढ़ते थे और उनके बीच करीबी संबंध थे। हालांकि, कुछ समय बाद जब छात्रा ने आरोपी से दूरी बनाना शुरू कर दिया, तो वह इस बात को पचा नहीं पाया। वह लगातार गुस्से और आक्रोश में रहने लगा।

30 अगस्त 2016 को, जब छात्रा अपनी क्लास में बैठी थी, तभी आरोपी जबरन अंदर घुस आया। उसने पहले लड़की के साथ दुर्व्यवहार किया और फिर लकड़ी के एक भारी लट्ठे से उसके सिर पर ताबड़तोड़ कई वार किए। इस जानलेवा हमले में बीच-बचाव करने आए एक असिस्टेंट प्रोफेसर भी घायल हो गए। इसके बाद आरोपी पूरी क्लास को धमकाते हुए वहां से फरार हो गया।

घायल छात्रा को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस ने शुरुआत में हत्या के प्रयास का मामला दर्ज किया था, जिसे बाद में हत्या (IPC 302) में बदल दिया गया और आरोपी को उसी दिन गिरफ्तार कर लिया गया था।

सोशल मीडिया के ‘कागजी शेरों’ का जिक्र

मद्रास हाईकोर्ट ने आज के युवाओं के रवैये पर उंगली उठाते हुए कहा कि दिनदहाड़े क्लास के अंदर हुई इस वारदात के समय किसी भी छात्र ने आरोपी को पकड़ने या रोकने का प्रयास नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि अगर वे उस वक्त डर गए थे, तो कम से कम अदालत के सामने आकर सच तो बोल सकते थे।

पीठ ने सोशल मीडिया पर केवल बड़ी-बड़ी बातें करने वालों को कड़ा संदेश देते हुए कहा, “सोशल मीडिया पर सिर्फ असहमति और विचार व्यक्त करने से कोई फायदा नहीं है, जब तक इसे असल जिंदगी में कार्रवाई में न बदला जाए।”

अदालत ने कहा कि अगर युवा अन्याय के खिलाफ खड़े नहीं हो सकते, तो वे असल जिंदगी में सिर्फ ‘कागजी शेर’ बनकर रह जाएंगे। जज ने कहा कि छात्रों को यह समझना होगा कि अगर वे आज चुप रहे, तो किसी भी अन्य छात्र के साथ ऐसी घटना होने में अब ज्यादा समय नहीं लगेगा।

घायल प्रोफेसर की गवाही बनी मजबूत आधार

अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले में एक घायल गवाह (असिस्टेंट प्रोफेसर) की गवाही मौजूद है, जिसकी विश्वसनीयता कानूनन बहुत अधिक होती है। इसे खारिज करने के लिए बहुत ठोस कारणों की आवश्यकता होती है, जो आरोपी के पास नहीं थे। इसके अलावा, पुलिस द्वारा बरामद किया गया हथियार और मेडिकल साक्ष्य आरोपी के खिलाफ पुख्ता सबूत थे।

हाईकोर्ट ने खारिज कर दी अपील

मद्रास उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले में किसी भी तरह के हस्तक्षेप से इनकार करते हुए आरोपी की आपराधिक अपील को खारिज कर दिया है। अदालत ने आईपीसी की धारा 302 (हत्या), जबरन प्रवेश, आपराधिक धमकी और अश्लील भाषा के प्रयोग सहित सभी मामलों में उसकी दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है।

हाईकोर्ट ने निचली अदालत को निर्देश दिया है कि वह यह सुनिश्चित करने के लिए तुरंत कदम उठाए कि आरोपी अपनी शेष बची उम्रकैद की सजा काटने के लिए जेल में उपस्थित रहे।

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