मद्रास हाई कोर्ट ने शुक्रवार को एक तमिलनाडु वक्फ बोर्ड के एक मामले में सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी की और कहा कि किसी जमीन पर दरगाह बनने से वह जमीन वक्फ बोर्ड की संपत्ति नहीं बन जाती।
जस्टिस के. गोविंदराजन थिलाकवाड़ी ने सुनवाई के दौरान कहा वक्फ को अपना मालिकाना हक कानूनी रूप से साबित करना होगा।
हर कब्रगाह या दरगाह वक्फ संपत्ति नहीं- हाईकोर्ट
मद्रास हाई कोर्ट ने अपने 5 जून के फैसले में कहा, किसी दरगाह का अस्तित्व मात्र बोर्ड को स्वतः अधिकार नहीं देता, जबतक की संस्था को कानून के मुताबिक वक्फ के रूप में माना या ना माना जाए। जस्टिस ने इस बार पर भी जोर दिया कि हर कब्र या दरगाह अपने आप वक्फ बोर्ड की संपत्ति नहीं बन जाती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम कानून द्वारा मान्यता प्राप्त किसी धार्मिक, नेक या धर्मार्थ उद्देश्य के लिए किसी मुस्लिम द्वारा संपत्ति का स्थायी समर्पण होना जरूरी है।
कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए तमिलनाडु के वक्फ बोर्ड के उस प्रस्ताव को रद्द कर दिया। प्रस्ताव में चेन्नई के ट्रिप्लिकेन स्थित सरकार सैयद हबीबुल्लाह शाह खदारी आरिफ रब्बानी हजरत दरगाह के लिए एक मुतवल्ली नियुक्त किया गया था और बिना पूर्व सर्वे के वक्फ एक्ट के तहत दरगार के पंजीकरण का निर्देश दिया गया था।
वक्फ बोर्ड के फैसले को चुनौती दी
यह मामला ट्रिप्लिकेन के कामराज रोड पर स्थित एक दरगाह से जुड़ा हुआ था मुतवल्ली की ओर से अपीलकर्ता ने दावा किया कि दरगाह 240 वर्ष पुराना है और उनके परिवार की ओर से इसकी देखरेख की जा रही है। उन्होंने दरगाह के मुतवल्ली के रूप में ए शैंशा की नियुक्ति के वक्फ बोर्ड के फैसले को चुनौती दी।
जमीन लोक निर्माण विभाग की थी
उन्होंने अपने तर्क में कहा कि यह जमीन वक्फ बोर्ड की नहीं है बल्कि यह लोक निर्माण विभाग की थी। उन्होंने यह भी दलील दी कि वक्फ एक्ट के तहत प्रक्रिया का पालन किए बिना बोर्ड को संपत्ति को वक्फ संपत्ति घोषित करने या किसी अन्य मुतवल्ली को नियुक्त करने का कोई अधिकार नहीं था।
तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने इस अपील का विरोध किया और तर्क दिया कि जमीन और आसपास के क्षेत्र मूल रूप से दरगाह के थे और बाद में नगरपालिका अधिकारियों और लोक निर्माण विभाग के कब्जे में आ गए। आगे कहा कि वक्फ एक्ट की धारा 36(4) के तहत दरगाह का रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया के अधीन है।
हालांकि लोकनिर्माण विभाग ने बताया कि यह जमीन सरकारी पोराम्बोक भूमि के रूप में चिह्नित थी और इसे भारत स्काउट्स एंड गाइड्स को बिना किराए के अलॉट किया गया था। लेकिन परिवार ने उसकी सहमति के बिना दरगाह की जमीन को धोखाधड़ी से रजिस्टर करा लिया था।
वक्फ के प्रमाण नहीं- कोर्ट
कोर्ट ने पाया कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि संपत्ति को वक्फ की सूची में शामिल किया जाए। कोर्ट ने यह भी पाया कि जमीन का सर्वे भी नहीं किया गया और न ही इसे सरकारी राजपत्र में वक्फ संपत्ति के रूप में अधिसूचित किया गया।
कोर्ट ने कहा, “किसी संपत्ति को वक्फ संपत्ति घोषित करने से पहले उसका सर्वे कराना जरूरी है। यदि किसी दरगाह का कभी सर्वे नहीं कराया गया है, उसे रजिस्टर नहीं किया गया है या वक्फ के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया है तो वक्फ बोर्ड केवल इसलिए कंट्रोल नहीं कर सकता क्योंकि वह एक मुस्लिम संस्था है।”
कोर्ट ने रद्द किया वक्फ के रजिस्ट्रेशन संबंधी निर्देश
आगे कहा कि वक्फ को किसी संस्था पर नियंत्रण करने से पहले उसके अधिकार क्षेत्र से संबंधित तथ्यों को स्थापित करना होगा और मुतवल्ली की नियुक्ति के लिए आमतौर पर वक्फ का अस्तित्व जरूरी होता है।
चूंकि अपीलकर्ता और प्रतिवादी दोनों ही दरगाह पर दावा कर रहे हैं, ऐसे में विवाद को पहले एक सक्षम दीवानी कोर्ट द्वारा सुलझाया जाना चाहिए। कोर्ट ने अपील को स्वीकार किया और वक्फ बोर्ड के मुतवल्ली के नियुक्ति और दरगाह के रजिस्ट्रेशन संबंधी निर्देशों को रद्द कर दिया।
यह भी पढ़ें: ‘भगवान मंत्रियों का इंतजार नहीं करते, सब बराबर हैं’, मद्रास हाई कोर्ट ने मंदिरों में VIP दर्शन पर उठाए सवाल
मद्रास हाई कोर्ट ने शुक्रवार को टिप्पणी करते हुए कहा कि हिंदू मंदिरों में सशुल्क वीआईपी दर्शन गलत और भेदभावपूर्ण है। न्यायालय ने कहा कि गिरजाघरों और मस्जिदों में ऐसी कोई प्रथा नहीं अपनाई जाती है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
