कलकत्ता हाई कोर्ट ने गुरुवार को राज्य सरकार से पूछा कि क्या उसने पश्चिम बंगाल की मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने के लिए कोई एक्शन लिया है। एक्टिंग चीफ जस्टिस तापब्रता चक्रवर्ती और जस्टिस अतरूप बनर्जी की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका पर राज्य सरकार से यह सवाल किया। जिसमें विभिन्न धार्मिक संस्थानों को अपने परिसरों से लाउडस्पीकर हटाने के लिए कथित पुलिस निर्देशों को चुनौती दी गई थी। साथ ही आरोप लगाया गया था कि बिना लिखित आदेश के बंगाल की 4,000 मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटा दिए गए हैं।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत एडवोकेट जनरल (AG) सुरजीत नाथ मिश्रा से कहा, “कृपया हमें बताएं कि क्या राज्य द्वारा किसी तरह की कार्रवाई की गई या नहीं। इसके बाद मित्रा ने निर्देश देने के लिए वक्त मांगा और कोर्ट से मामले की सुनवाई अगले सप्ताह करने का अनुरोध किया। अब इस मामले की अगली सुनवाई 18 अगस्त को होगी।

दानिश फारूकी ने अपनी याचिका में क्या कहा?

जनहित याचिका वकील दानिश फारूकी ने दायर की थी। जिसमें हुगली और अन्य जिलों में पुलिस द्वारा मस्जिदों और मंदिरों सहित विभिन्न पूजा स्थलों को उनके परिसर में लगे लाउडस्पीकर हटाने के लिए जारी किए गए मौखिक निर्देशों को चुनौती दी गई थी।

दानिश फारूकी ने अपनी याचिका में कहा, “प्रतिवादी पुलिस अधिकारी बिना किसी लिखित आदेश, अधिसूचना या कानूनी मंजूरी के और ध्वनि प्रदूषण (नियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 के किसी भी उल्लंघन का पता लगाने के लिए इन लाउडस्पीकरों से निकलने वाली ध्वनि के डेसिबल स्तर को मापने के लिए कोई अभ्यास किए बिना, इन धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन को अपने गैरकानूनी फरमानों का पालन करने के लिए मजबूर कर रहे हैं।”

‘अजान इस्लामी आस्था का अभिन्न पार्ट’

फारूकी ने कहा कि अजान (नमाज) इस्लामी आस्था का एक अभिन्न और जरूरी पार्ट है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित है और इस तरह का पूर्ण प्रतिबंध इस मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है।

फारूकी का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंद्योपाध्याय ने कहा कि पुलिस ने मस्जिद प्रबंधन पर दबाव डाला और बिना किसी औपचारिक नोटिस के लगभग 4000 मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटवा दिए। उन्होंने कहा कि अब यह एक चलन बन गया है कि लिखित आदेश नहीं दिया जाता है।

बंदोपाध्याय ने कहा कि कानून में यह बात स्पष्ट है कि लाउडस्पीकरों का उपयोग जायज डेसिबल स्तर के अनुरूप किया जा सकता है। उन्होंने न्यायालय से अनुरोध किया कि वह मानदंडों और पूर्व के अदालती आदेशों के अनुसार लाउडस्पीकरों के उपयोग की अनुमति दे। हालांकि, न्यायालय ने कहा कि किसी भी अंतरिम आदेश को पारित करने पर विचार करने से पहले उसे याचिकाकर्ता के दावों पर राज्य के रुख की जांच करनी होगी।

इसके जवाब में अटॉर्नी जनरल मित्रा ने कहा कि याचिका को खर्च सहित खारिज किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक वकील द्वारा दायर याचिका में कथित निर्देशों के स्रोत का खुलासा नहीं किया गया है। मित्रा ने कहा कि क्या अदालत इस मामले पर आगे बढ़ सकती है? एक भी नाम नहीं है। मित्रा ने आगे कहा कि याचिका में किसी भी मस्जिद का नाम नहीं बताया गया है जहां से लाउडस्पीकर हटाए गए थे।

अदालत के सवाल पर मित्रा ने दिया जवाब

हालांकि, कलकत्ता हाई कोर्ट ने पूछा कि क्या पुलिस ने वास्तव में ऐसी कोई कार्रवाई की थी। मित्रा ने कहा कि अब तक कोई भी इमाम या मस्जिद प्रबंधन सामने आकर यह नहीं कह रहा है कि पुलिस ने ऐसी कार्रवाई की। उन्होंने अदालत से कहा कि याचिकाकर्ता सिर्फ यह कह रहा है कि ‘मुझे जानकारी मिली है’। ऐसी बातें कहने के लिए कुछ जिम्मेदारी भी होनी चाहिए।

हालांकि, न्यायालय ने पूछा कि क्या राज्य का यह स्पष्ट रुख है कि याचिका में लगाए गए आरोप पूरी तरह झूठे हैं। न्यायमूर्ति चक्रवर्ती ने राज्य सरकार से आरोपों पर विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा और पूछा कि क्या आपका कहना है कि यह आरोप बिल्कुल गलत हैं? मित्रा ने कहा कि इस सवाल का जवाब देने के लिए उन्हें संबंधित अधिकारियों से निर्देश लेने होंगे।

हाई कोर्ट से कंटेंट क्रिएटर माधबी बिस्वास को झटका

कंटेंट क्रिएटर माधबी बिस्वास चक्रवर्ती को बुधवार को बड़ा झटका लगा है। त्रिपुरा हाई कोर्ट ने उनके खिलाफ आपराधिक मानहानि और आईटी अधिनियम के तहत लगाए गए आरोपों को रद्द करने से इनकार कर दिया। माधबी बिस्वास चक्रवर्ती पर आरोप है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अगरतला के मेयर दीपक मजूमदार और देवी माता त्रिपुरेश्वरी के बारे में अपमानजनक पोस्ट की थी। पढ़ें पूरी खबर।