कर्नाटक उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक 75 वर्षीय व्यक्ति को जमानत दे दी जिस पर उसकी बहू ने बार-बार यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। शिकायतकर्ता ने जमानत दिए जाने पर कोई आपत्ति नहीं जताई और न्यायालय को सूचित किया कि विवाद सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाया जा रहा है।
न्यायमूर्ति एमजीएस कमल बहू द्वारा ससुर पर लगाए गए यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के आरोपों के संबंध में दायर की गई एक नियमित जमानत याचिका की सुनवाई कर रहे थे।
बुजुर्ग पर यौन उत्पीड़न के आरोप
यह मामला महिला द्वारा दायर शिकायत के आधार पर दर्ज किया गया था जिसमें उसने अपने ससुर, पति, सास और दादी सास द्वारा उत्पीड़न, यौन उत्पीड़न और मानसिक यातना देने का आरोप लगाया था। महिला ने आरोप लगाया था कि उसके ससुर ने कई मौकों पर उसका यौन उत्पीड़न किया था। उनकी शिकायत के आधार पर याचिकाकर्ता और परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया था।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता सैयद नसीरुद्दीन ने कर्नाटक हाई कोर्ट के समक्ष तर्क दिया कि आरोपी 75 वर्ष के हैं और एक वरिष्ठ नागरिक हैं। उन्होंने यह तर्क दिया कि याचिकाकर्ता को शिकायतकर्ता और उसके पति के बीच वैवाहिक विवाद के कारण झूठा फंसाया गया था और शिकायत में अहम जानकारी के बिना लगाए गये आरोप शामिल थे। इसलिए, उन्होंने जमानत की मांग की।
इस दौरान महिला खुद अदालत में उपस्थित थीं और उनके वकील भी मौजूद थे। महिला और उनके वकील ने कहा कि उन्हें जमानत दिए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है और अदालत को सूचित किया कि मामला दोनों पक्षों के बीच सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाया जा रहा है।
जमानत की शर्तें
अभियुक्त को इस शर्त के साथ जमानत दी गयी कि वह निचली अदालत की संतुष्टि के अनुरूप 1 लाख रुपये की राशि का निजी मुचलका और इतनी ही राशि के दो स्थानीय जमानती पेश करे। अभियुक्त को यह भी निर्देश दिया गया कि वह ट्रायल कोर्ट के समक्ष सुनवाई की सभी तारीखों पर नियमित रूप से उपस्थित हो जब तक कि न्यायालय वैध कारणों से उसकी उपस्थिति से छूट न दे दे। इसके अलावा यह भी कहा गया कि आरोपी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अभियोजन पक्ष के गवाहों को धमकाना या उनके साथ छेड़छाड़ नहीं करेगा।
आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को पूछा कि जो परिवार पहले से शिक्षा और आर्थिक रूप से काफी आगे बढ़ चुके हैं, क्या उन्हें आरक्षण का लाभ मिलते रहना चाहिए। एक मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि अगर माता-पिता दोनों आईएएस अधिकारी हैं, तो उनके बच्चों को आरक्षण की जरूरत क्यों होनी चाहिए। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें
