पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि ट्यूशन क्लास से बचने के लिए हत्या के आरोप में गिरफ्तार 16 वर्षीय किशोर पर वयस्क के रूप में मुकदमा चलाया जाएगा। अदालत ने कहा कि यह देखा गया कि याचिकाकर्ता अपने शिक्षक पर दोष मढ़ने का प्रयास कर रहा था।
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के एक आदेश को बरकरार रखा है जिसमें निर्देश दिया गया है कि अपने ट्यूशन शिक्षक की सास की हत्या के आरोपी 16 वर्षीय किशोर पर वयस्क के रूप में मुकदमा चलाया जाए। न्यायमूर्ति जसजीत सिंह बेदी एक नाबालिग की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे जिसने निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उसे वयस्क के रूप में मुकदमा चलाने का निर्देश दिया गया था।
अदालत ने 6 जुलाई को कहा, “दिलचस्प बात यह है कि याचिकाकर्ता टीचर पर अपनी सास (मृत) के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध न होने और एक बार उन्हें थप्पड़ मारने का आरोप लगाकर दोष मढ़ने की कोशिश में काफी परिपक्व प्रतीत होता है।”
लड़का ट्यूशन क्लास में नहीं जाना चाहता था
आदेश में कहा गया है कि नाबालिग के पिता के अनुसार, लड़का ट्यूशन क्लास में नहीं जाना चाहता था और उसने अपनी टीचर को धमकाने की कोशिश में हत्या कर दी। किशोर न्याय बोर्ड (JJB) की रिपोर्ट पर विचार करते हुए, न्यायालय ने पाया कि मनोरोग, सामाजिक जांच और मूल्यांकन रिपोर्टों से पता चलता है कि उसमें अपराध के परिणामों को समझने की मानसिक क्षमता और परिपक्वता थी।
किशोर ने टीचर की सास पर हमला किया
फरीदाबाद में 5 अगस्त, 2025 को दर्ज एफआईआर के अनुसार, ट्यूशन टीचर ने आरोप लगाया कि उसके 16 वर्षीय स्टूडेंट ने उसकी सास पर उस समय हमला किया जब वह बाथरूम में थी। पीड़िता की बाद में चोटों के कारण मृत्यु हो गई। एफआईआर में कहा गया है कि लड़का उसी इमारत में रहने वाली महिला के घर पर ट्यूशन जाता था। यह दावा किया गया कि लड़का घटना वाले दिन वह समय से 5-7 मिनट पहले पहुंच गया था लेकिन अपनी नोटबुक नहीं लाया था।
टीचर ने बताया कि उसने लड़के को नोटबुक लाने के लिए वापस भेजा और खुद बाथरूम चली गई। बाथरूम में ही उसने अपनी सास की चीख सुनी और दौड़कर बाहर आई तो देखा कि वह खून से लथपथ बिस्तर पर पड़ी थी। ट्यूशन टीचर ने बताया कि उसने लड़के को उसी कमरे में खड़ा देखा। वह चीखी, बाहर भागी और पड़ोसियों को मदद के लिए पुकारा।
जेजेबी ने किशोर के रूप में मुकदमा चलाने की उठाई मांग
घटना के समय आरोपी की उम्र लगभग 16 साल और 4 महीने थी। उसे जेजेबी के समक्ष पेश किया गया। सामाजिक जांच रिपोर्ट, मनोरोग मूल्यांकन और प्रारंभिक आकलन पर विचार करने के बाद, बोर्ड ने 5 जनवरी को फैसला सुनाया। जिसके मुताबिक, लड़के की उम्र, आपराधिक रिकॉर्ड की कमी, शैक्षणिक रिकॉर्ड और अपराध की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उस पर किशोर के रूप में मुकदमा चलाया जाना चाहिए ।
शिकायतकर्ता महिला ने निचली अदालत में इस आदेश को चुनौती दी जिसे 12 मार्च को निचली अदालत ने रद्द कर दिया। निचली अदालत ने माना कि लड़के में अपराध करने और उसके परिणामों को समझने की मानसिक और शारीरिक क्षमता थी इसलिए उस पर वयस्क के रूप में मुकदमा चलाया जाना चाहिए। इसके बाद लड़के ने इस आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की।
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का आदेश
उच्च न्यायालय ने गौर किया कि मनोचिकित्सक की रिपोर्ट में कहा गया है कि नाबालिग एक औसत से ऊपर का छात्र था, उसे पहले कभी कोई मानसिक बीमारी नहीं थी और वह कथित अपराध की प्रकृति और उसके परिणामों को समझने में मानसिक रूप से सक्षम था। निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि मनोरोग, सामाजिक जांच और प्रारंभिक मूल्यांकन रिपोर्टों से पता चलता है कि लड़के में अपराध करने की मानसिक और शारीरिक क्षमता थी और वह इसकी प्रकृति और परिणामों को समझता था इसलिए वयस्क के रूप में मुकदमा चलाना उचित था।
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