Justice Yashwant Varma Resignation: इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा ने शुक्रवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। दिल्ली हाईकोर्ट में नियुक्ति के दौरान जस्टिस वर्मा के घर पर लगी आग के बाद जले हुए नोट मिले थे। जिसके बाद उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया जारी थी। संसदीय कमेटी जस्टिस वर्मा के खिलाफ जांच कर रही थी लेकिन अब जब जस्टिव वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है, तो उनके खिलाफ चल रही महाभियोग की प्रक्रिया खत्म हो जाएगी।
जस्टिस यशवंत वर्मा महाभियोग की धारा 3 के तहत जांच का सामना कर रहे थे। बता दें कि यह धारा किसी जज के दुर्व्यवहार या अक्षमता की जांच के लिए एक समिति के गठन से संबंधित है। जानकारी के अनुसार, जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपना इस्तीफ़ा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दिया है।
संसदीय समिति में होने वाली थी सुनवाई
बता दें कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ जो आरोप लगे थे, उस मामले में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा नियुक्त संसदीय समिति शुक्रवार से अपनी सुनवाई शुरू करने वाली थी। इससे पहले ही जस्टिस वर्मा ने अपना पद छोड़ दिया है।
क्या हैं पदमुक्ति के नियम?
संविधान के अनुच्छेद 217 (हाई कोर्ट के जज की नियुक्ति और पद की शर्तें) के उप-अनुच्छेद (1) के अनुसार, हाई कोर्ट के प्रत्येक जज की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुहर वाले वारंट के माध्यम से की जाएगी। अतिरिक्त या कार्यवाहक जज के मामले में वह अनुच्छेद 224 में निर्धारित अवधि तक पद पर बने रहेंगे; जबकि अन्य मामलों में, वह 62 वर्ष की आयु पूरी होने तक पद पर बने रहेंगे। हालांकि, इसके लिए कुछ शर्तें भी हैं, जिनका पालन किया जाना अनिवार्य है।
- कोई भी जज, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्तलिखित पत्र के माध्यम से अपने पद से इस्तीफ़ा दे सकता है।
- किसी जज को उसके पद से हटाने के लिए राष्ट्रपति द्वारा वही प्रक्रिया अपनाई जाएगी जो संविधान के अनुच्छेद 124 के खंड (4) में सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने के लिए निर्धारित है।
- किसी जज का पद तब रिक्त माना जाएगा, जब राष्ट्रपति द्वारा उसे सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त कर दिया जाए, अथवा जब राष्ट्रपति द्वारा उसका ट्रांसफर भारत के किसी अन्य हाई कोर्ट में कर दिया जाए।
क्या है महाभियोग प्रक्रिया के नियम?
संविधान के अनुच्छेद 124 (सुप्रीम कोर्ट की स्थापना और गठन) के खंड (4) में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के किसी भी जज को उसके पद से तब तक नहीं हटाया जाएगा, जब तक कि संसद के दोनों सदनों द्वारा एक प्रस्ताव राष्ट्रपति को उसी सत्र में प्रस्तुत न कर दिया जाए।
हालांकि, इसका अहम पहलू यह भी है कि प्रस्ताव में सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत से तथा उस सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत से समर्थित होना चाहिए। यह प्रस्ताव ‘सिद्ध दुर्व्यवहार’ या ‘अक्षमता’ के आधार पर जज को हटाने के लिए लाया जाता है, और इसके बाद ही राष्ट्रपति द्वारा उसे हटाने का आदेश जारी किया जाता है।
संसद के दोनों सदनों में पेश हुआ था प्रस्ताव
सुप्रीम कोर्ट ने पहले जस्टिस वर्मा की याचिका खारिज कर दी थी। जस्टिस वर्मा ने जांच अधिनियम, 1968 के तहत लोकसभा स्पीकर द्वारा गठित उस समिति की वैधता को चुनौती दी थी, जिसे उनके दिल्ली स्थित घर से जली हुई नकदी मिलने के आरोपों की जांच के लिए बनाया गया था। जस्टिस वर्मा को हटाने के प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में पेश किए गए थे। अगस्त 2025 में समिति का गठन करते समय स्पीकर ने कहा था कि जज को हटाने का प्रस्ताव तब तक लंबित रहेगा जब तक समिति अपनी रिपोर्ट जमा नहीं कर देती।
ऐसे में शुक्रवार को जब संसदीय समिति जस्टिस वर्मा के खिलाफ जांच के मामले में सुनवाई करने वाली थी, उससे पहले ही जस्टिस वर्मा ने राष्ट्रपति के पास अपना इस्तीफा पहुंचा दिया। इसके चलते जब नियमों के तहत जब यशवंत वर्मा ने अपने हस्ताक्षर वाला इस्तीफा राष्ट्रपति को भेज दिया है, तो उनके खिलाफ चल रही महाभियोग की कार्रवाई खत्म हो जाएगी।
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कैश कांड मामले में फंसे इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने इस्तीफा दे दिया है। जस्टिस वर्मा ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा भेजा है। अपने घर में मिले कथित कैश मिलने के चलते उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद ट्रांसफर कर दिया गया था। पढ़ें पूरी खबर।
