दिल्ली हाई कोर्ट की न्यायाधीश स्वर्णकांता शर्मा ने मंगलवार को कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम द्वारा याचिका की सुनवाई से खुद को अलग (Recuse) कर लिया। यह याचिका शराब कंपनी Diageo Scotland से जुड़े कथित रिश्वत मामले के संबंध में दाखिल की गई थी।

कार्ति चिदंबरम ने इस मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) द्वारा दर्ज भ्रष्टाचार के केस को रद्द करने की मांग करते हुए अदालत का रुख किया था। मंगलवार को जब मामले की सुनवाई शुरू हुई तो जस्टिस शर्मा ने कहा कि इस मामले को जुलाई में किसी अन्य बेंच के समक्ष लिस्ट किया जाएगा।

न्यायाधीश स्वर्णकांता ने कहा, ”इसे आगे बढ़ाना होगा। किसी अन्य बेंच के सामने इसे सूचीबद्ध करें।” उन्होंने यह भी कहा कि सीबीआई की इसी एफआईआर से संबंधित Advantage Strategic Consulting Private Limited द्वारा दायर एक अन्य मामला भी किसी दूसरी बेंच द्वारा सुना जाएगा।

क्या है मामला?

आपको बता दें कि सीबीआई ने कार्ति चिदंबरम पर आरोप लगाया है कि उन्होंने 2005 में शराब आयात पर लगे प्रतिबंध को हटाने के बदले Diageo स्कॉटलैंड से रिश्वत ली थी। उस समय उनके पिता पी. चिंदबरम केंद्रीय वित्त मंत्री थे।

कार्ति के खिलाफ सीबीआई ने भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी (आपराधिक साजिश) और 420 (धोखाधड़ी) के तहत मामला दर्ज किया है। इसके अलावा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत भी आरोप लगाए गए हैं।

एक और केस से खुद को किया था अलग

आपको बता दें कि कार्ति के मामले से पहले जज स्वर्णकांता ने आम आदमी पार्टी के पूर्व विधायक नरेश बाल्यान की जमानत याचिका से भी खुद को रिक्यूज कर लिया था।

केजरीवाल की याचिका की खारिज

लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट की जज ने अरविंद केजरीवाल की उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें उन्होंने आबकारी नीति मामले में सुनवाई अलग होने की अपील की थी।

अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया था कि जस्टिस स्वर्णकांता के बच्चे केंद्र सरकार के वकील के तौर पर पैनल में शामिल हैं ऐसे में मामले में हितों का टकराव पैदा हो रहा है। साथ ही तर्क दिया कि इससे पक्षपात की आशंका पैदा होती है। इसके बाद स्वर्णकांता बेंच ने कहा कि ये आरोप सिर्फ अटकलों पर आधारित हैं और पक्षपात की आशंका के कानूनी मापदंडों को पूरा करने में नाकाम रहे।

हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए जोर दिया कि कोर्टरूम सिर्फ धारणाओं का थिएटर नहीं बन सकता। साथ ही चेतावनी दी कि कोई भी ताकतवर राजनीतिक हस्ती, बिना ठोस सबूतों के, किसी मौजूदा जज पर आरोप लगाने की इजाजत नहीं पा सकती। कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका पर आरोप लगाए जाने पर भी निष्पक्षता का वही पैमाना लागू होता है और कहा कि ऐसी याचिकाओं पर विचार करने से संस्था की विश्वसनीयता कमजोर होगी। पढ़ें पूरी खबर…