सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस के.एम. जोसेफ ने हाल ही में केंद्र सरकार से कहा कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा दोबारा की गई जजों की नियुक्ति संबंधी सिफारिशों को लंबित नहीं रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसी सिफारिशें केंद्र सरकार पर बाध्यकारी होती हैं और उन पर अमल किया जाना चाहिए, जब तक कि नियुक्ति के खिलाफ कोई ठोस, प्रासंगिक और उचित कारण न हो।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस जोसेफ ने कहा कि मेरा अनुरोध है कि जब कॉलेजियम सेकेंड जजेज केस और थर्ड जजेज केस के तहत किसी नाम की सिफारिश करता है और उसे दोबारा दोहराता है, तो केंद्र सरकार उन प्रस्तावों को लंबित न रखे। यह समझा जाना चाहिए कि ऐसे उम्मीदवारों की नियुक्ति की जानी चाहिए, जब तक कि उनके रास्ते में कोई वास्तव में मजबूत, प्रासंगिक और न्यायिक नियुक्ति से जुड़ा कारण न हो।
जोसेफ ने जजों की नियुक्तियों को लेकर कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच चल रहे टकराव को भी जल्द समाप्त करने की अपील की। उन्होंने कहा कि दोनों संस्थाओं के बीच यह असहमति और असंतुलन खत्म होना चाहिए, ताकि देश को सबसे योग्य और बेहतरीन जज मिल सकें।
उन्होंने कहा कि मेरी अनुरोध है कि राज्य और न्यायपालिका के बीच यह टकराव और असामंजस्य जल्द से जल्द खत्म हो। तभी आपको सबसे बेहतरीन न्यायाधीश मिलेंगे, क्योंकि न्याय करना कोई आसान प्रक्रिया नहीं है।
केरल हाई कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा अमेरिका की स्वतंत्रता घोषणा की 250वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित एक व्याख्यान को संबोधित करते हुए जस्टिस जोसेफ ने कहा कि सेकेंड जजेज केस और थर्ड जजेज केस के फैसलों का मुख्य उद्देश्य न्यायपालिका को सरकारी नियंत्रण से मुक्त रखना था। उन्होंने कहा कि इन फैसलों के जरिए यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई थी कि न्यायाधीशों के रूप में ऐसे लोगों की नियुक्ति हो जो केवल कानून का ज्ञान ही न रखते हों, बल्कि उनमें निष्पक्षता, स्वतंत्र सोच और अन्य आवश्यक गुण भी हों।
जस्टिस के.एम. जोसेफ ने कहा कि जब वह सबसे बेहतरीन न्यायाधीशों की बात करते हैं तो उसका मतलब केवल कानून का गहरा ज्ञान रखने वाले व्यक्ति से नहीं है, बल्कि ऐसे व्यक्ति से है जिसमें अनेक नैतिक और मानवीय गुण हों।
उन्होंने कहा कि जब मैं सबसे बेहतरीन कहता हूं, तो उसमें कई तरह के गुण शामिल होते हैं। केवल कानून पढ़ लेना ही पर्याप्त नहीं है। हाल ही में पूर्व मुख्य न्यायाधीश एम.एन. वेंकटचलैया ने एक इंटरव्यू में कहा था, “अगर कोई सज्जन व्यक्ति है और उसे कानून की थोड़ी-बहुत समझ भी है, तो वह काफी है।”
जस्टिस जोसेफ ने कहा कि न्यायाधीश ऐसे होने चाहिए जो निडर और स्वतंत्र हों। उन्होंने सरकारों को आगाह करते हुए कहा कि किसी भी सरकार के लिए यह सोचना अल्पकालिक और अविवेकपूर्ण होगा कि यदि उसे ऐसे लोग मिल जाएं जो जरूरत पड़ने पर उससे सवाल न करें, तो उसने कोई बड़ी जीत हासिल कर ली है।
उन्होंने कहा कि हो सकता आपने जीत हासिल कर ली हो, लेकिन फिर उन महान, विद्वान और उच्च आदर्शों वाले न्यायाधीशों की विरासत का क्या होगा, जिन्होंने हमारे गणराज्य के निर्माण, उसे मजबूत बनाने और आज जिस मुकाम पर देश पहुंचा है, उसमें ऐतिहासिक योगदान दिया है?
जस्टिस के.एम. जोसेफ ने सुप्रीम कोर्ट में स्थायी संविधान पीठ बनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि मेरा विनम्र अनुरोध है कि सुप्रीम कोर्ट में एक परमानेंट कॉन्स्टिट्यूशनल बेंच होनी चाहिए।
जस्टिस जोसेफ ने सुप्रीम कोर्ट में बढ़ते लंबित मामलों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में इस समय करीब 93 हजार मामले लंबित हैं और सिर्फ जजों की संख्या बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। उन्होंने कहा कि जब तक नए मामलों के लगातार बढ़ते प्रवाह पर नियंत्रण नहीं किया जाता, तब तक केवल अधिक जज नियुक्त करने से लंबित मामलों का बोझ कम होना मुश्किल है।
पूर्व जज ने सुझाव दिया कि अब जबकि सुप्रीम कोर्ट में 38 जज हैं, तो एक स्थायी पांच सदस्यीय संविधान पीठ बनाई जा सकती है, जो संविधान से जुड़े लंबित और महत्वपूर्ण सवालों की नियमित सुनवाई कर सके। इससे संवैधानिक मामलों के निपटारे में तेजी आएगी और अदालत के कामकाज में भी सुधार होगा।
‘पद से इस्तीफा दें BCI के चेयरमैन मनन मिश्रा’, 700 वकीलों ने उठाई मांग, जानिए पत्र में क्या लिखा
नालसार विश्विद्यालय और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन मनन मिश्रा इस वक्त सुर्खियों में है। अब देश में 700 से ज्यादा सदस्यों वाले तीन वकील संगठनों ने रविवार को नालसार विवाद के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा के इस्तीफे की मांग की। वकीलों ने कहा कि अगर मनन मिश्रा इस्तीफा नहीं देते हैं, तो बार काउंसिल के अन्य सदस्यों को उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना चाहिए। पढ़ें पूरी खबर।
