प्रथम विश्व युद्ध के बीच ब्रिटेन की अदालतों पर भी युद्धकालीन मामलों का दबाव बढ़ चुका था। समुद्री व्यापार, जब्त जहाज़ों और युद्ध से जुड़े कानूनी विवादों पर लगातार सुनवाई चल रही थी। इसी दौरान ब्रिटेन के वरिष्ठ न्यायाधीश सर सैमुअल इवांस (Sir Samuel Evans) से जुड़ा एक ऐसा प्रसंग सामने आया जिसे आज भी ब्रिटिश न्यायिक इतिहास के दिलचस्प किस्सों में गिना जाता है।
वरिष्ठ वकील और भारत के सॉलिसिटर जनलर तुषार मेहता की हाल ही में आई किताब ‘The Lawful and the Awful: Quirky Tales’ में कानून की दुनिया से जुड़ी अजीबोगरीब और कुछ अलग हटकर कहानियों का जिक्र किया गया है। इस किताब में ऐसा ही एक किस्सा है साल 1916 का जब ब्रिटेन में एक जज ने अपने घर पर ड्रेसिंग गाउन में एक मामले का फैसला सुनाया। जानते हैं आखिर क्या है यह किस्सा और क्यों कानून की किताबों में आज भी इसका जिक्र होता है…
बात आज से 110 साल पहले की है जब लंदन के एक घर में एक बीमार जज आराम कर रहे थे। अदालत में सुनवाई के लिए पहुंचा यह एक ऐसा मामला जिसे टाला नहीं जा सकता था और फिर जो हुआ, वह ब्रिटिश न्यायिक इतिहास के सबसे दिलचस्प प्रसंगों में दर्ज हो गया।
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कौन थे सर सैमुअल इवांस (Sir Samuel Evans)
सर सैमुअल इवांस ब्रिटेन के प्रमुख न्यायाधीशों में शामिल थे। वे ‘नौवहन विभाग (Admiralty Division) से जुड़े मामलों की सुनवाई करते थे। उस दौर में समुद्री कानून और युद्धकालीन जहाज़ी विवाद बेहद महत्वपूर्ण माने जाते थे।
वह पहले वकील और सांसद भी रह चुके थे। बाद में उन्हें हाई कोर्ट में नियुक्त किया गया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उनके सामने बड़ी संख्या में समुद्री मामलों की सुनवाई आती थी। इवांस को ब्रिटेन की न्यायपालिका के उन जजों में गिने जाते थे जिनकी पहचान केवल कानून तक सीमित नहीं थी। उस पीढ़ी के कई ब्रिटिश न्यायाधीशों की तरह इवांस भी कठोर औपचारिकता वाले दौर से आए थे।
क्या था Prize Court?
आज के समय में यह शब्द कम सुनाई देता है लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के दौरान प्राइज़ कोर्ट बेहद महत्वपूर्ण संस्था थी।
जब युद्ध में किसी दुश्मन देश के जहाज़ को पकड़ा जाता था या समुद्र में किसी माल को जब्त किया जाता था, तब यह तय करने का अधिकार Prize Court के पास होता था कि जहाज़ वैध रूप से कब्जे में लिया गया या नहीं, माल किसका है और क्या उसे सरकार अपने नियंत्रण में रख सकती है।
युद्ध के समय में ऐसे मामलों का सीधा संबंध अंतरराष्ट्रीय राजनीति और व्यापार से होता था। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ऐसे मामलों की संख्या काफी बढ़ गई थी। समुद्री व्यापार पर युद्ध का सीधा असर पड़ रहा था और कई मामलों में तत्काल आदेश जरूरी होते थे।
बीमारी के बावजूद नहीं रुकी सुनवाई
कानूनी इतिहास का यह प्रसंग केवल सुनी-सुनाई या मौखिक कहानी नहीं है। इसका जिक्र ब्रिटिश ऐतिहासिक अभिलेखों और जीवनी संबंधी स्रोतों में मिलता है। Skewen and District Historical Society के आर्काइव रिकॉर्ड में सैमुअल इवांस के बारे में लिखा गया है कि फरवरी 1916 में उन्होंने घर पर ड्रेसिंग गाउन में Prize Court की बैठक की थी।
जैसा कि हमने बताया कि जज इवांस बीमार थे। उन्हें pleurisy नाम की फेफड़ों से जुड़ी बीमारी थी। इसके अलावा उनके पैर में भी चोट लगी थी जिस वजह से वह अदालत नहीं जा पा रहे थे। डॉक्टरों से उन्हें पूरी तरह आराम करने की सलाह दी गई थी। लेकिन लंबित मामलों की संवेदनशीलता को देखते हुए कार्यवाही टाली नहीं गई। इसके बजाय अदालत की प्रक्रिया उनके घर से संचालित की गई।
इसी संदर्भ में एक ऐतिहासिक उल्लेख मिलता है: ”In February 1916 he even held a sitting of the Prize Court at home in his dressing gown.” हिंदी में इसका मतलब है कि फरवरी 1916 में उन्होंने अपने घर पर ड्रेसिंग गाउन में बैठकर प्राइज़ कोर्ट की कार्यवाही की। यहीं से शुरू हुआ वह प्रसंग जिसने उन्हें इतिहास में अलग जगह दिला दी।
जब घर बना अदालत
फरवरी 1916 में जज इवांस ने फैसला किया कि अगर वह अदालत नहीं जा सकते तो अदालत उनके पास आएगी। उस दौर में ब्रिटिश अदालतें अपनी औपचारिक परंपराओं के लिए जानी जाती थीं। जजों के विशेष गाउन, विग और अदालत की तय प्रक्रिया न्यायिक व्यवस्था का अहम हिस्सा थे। ऐसे समय में किसी जज का घर से कार्यवाही करना असामान्य माना जाता था। यह कोई अनौपचारिक बातचीत नहीं थी बल्कि आधिकारिक न्यायिक कार्यवाही थी।
कानूनी दस्तावेज़, वकील और जरूरी प्रक्रिया घर पर पूरी की गई। फर्क सिर्फ इतना था कि कोर्टरूम की जगह जज का घर था। उनके घर में अस्थायी व्यवस्था की गई। जरूरी दस्तावेज़ पहुंचाए गए। वकील मौजूद हुए और फिर जज साहब अपने कमरे में, ड्रेसिंग गाउन पहने हुए, कार्यवाही के लिए बैठे। उन्होंने वहीं बैठकर Prize Court की सुनवाई की और जरूरी आदेश जारी किए।
क्यों चर्चा में रहा यह प्रसंग
इस घटना का जिक्र कई कारणों से होता है। पहला- यह उस दौर की न्यायिक प्रतिबद्धता को दिखाती है जब तकनीकी सुविधाएं लगभग नहीं थीं। दूसरा- यह बताती है कि युद्धकालीन परिस्थितियों में अदालतें किस तरह काम करती थीं और तीसरा- यह प्रसंग अदालतों की औपचारिक छवि के बीच एक मानवीय तस्वीर भी पेश करता है।
एक सदी बाद भी क्यों याद किया जाता है यह किस्सा?
कुछ सालों बाद जब दुनिया कोविड महामारी के दौरान वर्चुअल सुनवाई की ओर बढ़ी, तब भी कई कानून के कई लेखों में जज सैमुअल इवांस का यह उदाहरण याद किया गया।
यह केवल एक जज की कहानी नहीं है। यह उस विचार की कहानी है कि संस्थाएं भवनों से नहीं बल्कि लोगों से चलती हैं और कर्तव्य कभी-कभी, आराम से बड़ा हो जाता है और न्याय की कुर्सी केवल अदालत में नहीं, जिम्मेदारी में होती है।
