झारखंड हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण मामले में पति को तलाक देने से इनकार कर दिया। यह मामला एक ऐसे दंपति का था, जिनकी शादी लव मैरिज के रूप में 2011 में हुई थी, लेकिन बाद में उनके रिश्ते में गंभीर विवाद पैदा हो गए। कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ नौकरी के कारण अलग-अलग राज्यों में रहना या पति-पत्नी के बीच आपसी सामंजस्य (compatibility) की कमी “क्रूरता” नहीं मानी जा सकती।

यह फैसला जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की बेंच ने 10 अप्रैल के आदेश में सुनाया। अदालत ने पति की अपील खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें पत्नी के पक्ष में ‘दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना’ (Restitution of Conjugal Rights) का आदेश दिया गया था। इसका मतलब है कि कोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी को फिर से साथ रहकर वैवाहिक जीवन शुरू करना चाहिए।

कोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर छोटी-मोटी शिकायत या झगड़ा “क्रूरता” नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि शादीशुदा जीवन में कई बार स्वभाव का मेल न होना या सामान्य विवाद हो सकते हैं, लेकिन इन्हें क्रूरता नहीं कहा जा सकता। अदालत के अनुसार, क्रूरता तभी मानी जाएगी जब किसी एक पति या पत्नी का व्यवहार इतना गंभीर और लगातार हो कि दूसरे का जीवन असहनीय हो जाए और उसके साथ रहना मानसिक रूप से कठिन हो जाए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि क्रूरता में मानसिक पीड़ा, अपमान, अपशब्द, या ऐसा व्यवहार शामिल हो सकता है जिससे किसी व्यक्ति को लगातार मानसिक कष्ट हो। लेकिन यह सब “साधारण वैवाहिक तनाव” से ज्यादा गंभीर होना चाहिए। एक महत्वपूर्ण बात यह भी कही गई कि कोर्ट में दिए गए लिखित बयान में पति या पत्नी द्वारा एक-दूसरे पर लगाए गए गंभीर आरोप भी कई बार क्रूरता माने जा सकते हैं।

नौकरी और अलग रहने का मुद्दा

इस मामले में पति केंद्रीय सरकारी कर्मचारी है और उसकी नौकरी ओडिशा में है, जबकि पत्नी झारखंड सरकार में काम करती हैं और उनकी पोस्टिंग झारखंड में है। कोर्ट ने यह भी कहा कि पति की नौकरी ट्रांसफर योग्य है और उसके दफ्तर दुमका में भी स्थित हैं, जहां पत्नी रहती है। इसलिए वह चाहें तो पत्नी के साथ रह सकता है।

दांपत्य अधिकार क्या है?

कोर्ट ने समझाया कि पति-पत्नी का साथ रहने का अधिकार केवल कानून से नहीं आता, बल्कि यह विवाह की मूल भावना का हिस्सा है। यदि कोई पति या पत्नी बिना किसी उचित कारण के दूसरे से अलग रहता है, तो दूसरा पक्ष कोर्ट में ‘दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना’ की मांग कर सकता है। अगर कोर्ट को लगता है कि कारण उचित नहीं है, तो वह साथ रहने का आदेश दे सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि

इस दंपति ने 2011 में परिवार की असहमति के बावजूद प्रेम विवाह किया था। शुरुआत में दोनों रांची में साथ रहे और बाद में दुमका चले गए। उनके कोई बच्चे नहीं हैं। पत्नी को 2015 में झारखंड में सरकारी नौकरी मिल गई। पत्नी का कहना था कि वह अपने परिवार की आर्थिक मदद करती थी, लेकिन पति इससे नाराज रहता था और अक्सर झगड़ा करता था। इसके बाद विवाद बढ़ते गए। 2016 से स्थिति और बिगड़ गई, जब पत्नी के कुछ परिजन उसके साथ रहने लगे और पति इससे असंतुष्ट हो गया।

पति उस समय ओडिशा में नौकरी कर रहा था और उसने पत्नी से नौकरी छोड़कर उसके साथ रहने को कहा, लेकिन पत्नी ने नौकरी छोड़ने से इनकार कर दिया। इसके बाद दोनों के बीच विवाद और बढ़ गया। 2016 में पति ने फैमिली कोर्ट में दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए केस दायर किया। 2018 में फैमिली कोर्ट ने पति के पक्ष में फैसला दिया और पत्नी को पति के साथ रहने का आदेश दिया। पत्नी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जो अभी भी लंबित है।

पत्नी का कहना था कि वह कई बार पति के पास रहने गई, लेकिन जुलाई 2019 में पति ने उसे घर में प्रवेश नहीं करने दिया। वहीं पति का कहना था कि पत्नी ने उसके साथ सही तरीके से कभी साथ नहीं रहा और उसे छोड़ दिया। बाद में पत्नी ने कहा कि वह शादी जारी रखना चाहती है, जबकि पति ने तलाक की मांग करते हुए आरोप लगाया कि पत्नी ने उसके साथ क्रूरता और परित्याग (desertion) किया है।

हाईकोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने कहा कि पति यह साबित नहीं कर सका कि फैमिली कोर्ट का आदेश गलत या मनमाना था। इसलिए उसकी तलाक की अपील खारिज कर दी गई। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मामलों में उद्देश्य यह होता है कि दोनों पक्ष फिर से साथ आकर शांति से वैवाहिक जीवन जी सकें। इस तरह, अदालत ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि केवल नौकरी की दूरी, मतभेद या सामान्य वैवाहिक समस्याएं तलाक का आधार नहीं बन सकतीं, जब तक कि क्रूरता कानूनी रूप से गंभीर स्तर तक साबित न हो।

यह भी पढ़ें: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से बहस करते हुए केजरीवाल का VIDEO वायरल, हाई कोर्ट ने दिया हटाने का आदेश

दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया है कि आबकारी नीति मामले में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के सामने बहस करते हुए अरविंद केजरीवाल के अनधिकृत वीडियो रिकॉर्डिंग को हटाया जाए। Bar & Bench की एक रिपोर्ट में दिल्ली हाई कोर्ट के एक अधिकारी के हवाले से यह जानकारी दी है। अधिकारी ने बताया कि कोर्ट में सुनवाई के दौरान बिना अनुमति रिकॉर्डिंग की इजाजत नहीं है। दिल्ली हाई कोर्ट के ऑनलाइन सुनवाई से संबंधित नियम है कि अदालत की कार्यवाही के वीडियो को रिकॉर्ड करके पब्लिश नहीं किया जा सकता। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक