झारखंड हाई कोर्ट ने सोमवार को रेप पीड़िताओं के लिए कानूनी और सामाजिक हालात बेहतर बनाने और समाज से पीड़ित को ही दोषी की नजर से देखने वालों की सोच बदलने के लिए राज्य सरकार को कई निर्देश जारी किए। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से जीरो एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य करने को कहा। साथ ही पीड़िताओं के लिए टू-फिंगर टेस्ट पर पूरी तरह रोक लगाने का निर्देश भी दिया।
झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एम.एस. सोनाक और जस्टिस राजेश शंकर की बेंच रेप पीड़िताओं की सुरक्षा और पुनर्वास से जुड़ी एक स्वत: संज्ञान वाली जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
परिवारों को करना पड़ता मुश्किलों का सामना
कोर्ट ने अपनी 8 जून की सुनवाई के दौरान कहा, “हमें यह देखकर काफी दुख होता है कि कुछ स्थितियों में रेप पीड़िताओं को समाज में मजाक का पात्र बनाया जाता है, जैसे वे ही आरोपी हों। कुछ मामलों में पीड़िताओं का सामाजिक बहिष्कार किया जाता है, जिससे उन्हें और उनके परिवारों को भारी मुश्किलों और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है।”
कोर्ट ने अपने आदेश में जोर देते हुए कहा, ऐसे मामले भी सामने आते हैं जिनमें पड़ोसियों के उदासीन रवैये के कारण पीड़िताओं और उनके परिजनों को अपने घर में रहने में दिक्कत होने लगती है और वे वह जगह छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं। बेंच ने कहा, “इसके लिए सामाजिक संवेदनशीलता की जरूरत है। हमें उम्मीद है कि पीड़ित को ही दोषी ठहराने वाला लोगों का नजरिया धीरे-धीरे बदलेगा।”
राज्य सरकार को दिया आदेश
आदेश में झारखंड सरकार को यह निर्देश भी दिया गया कि वह सभी सरकारी और निजी अस्पतालों/मेडिकल संस्थानों में “टू-फिंगर टेस्ट” पर रोक लगाने वाला एक सर्कुलर जारी करे। साथ ही, यह भी कहा गया कि इस सर्कुलर का उल्लंघन करने पर इसे पेशेवर कदाचार माना जाएगा और दोषी व्यक्ति के खिलाफ कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी।
आदेश में झारखंड सरकार को यह निर्देश भी दिया गया कि वह सभी सरकारी और निजी अस्पतालों/मेडिकल संस्थानों में टू फिंगर टेस्ट पर रोक लगाने वाला एक सर्कुलर जारी करें। साथ ही कहा गया कि अगर कोई सर्कुलर का उल्लंघन करे तो उसके पेशेवर गलती मानी जाए और दोषी व्यक्ति के खिलाफ कानून के मुताबिक सख्त कार्रवाई की जाए।
‘रेप पीड़िताओं के साथ संवेदनशीलता से पेश आएं’
हाईकोर्ट ने कहा कि रेप पीड़िताओं के साथ पूरी संवेदनशीलता से पेश आना संबंधित पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी है। पीड़िताओं के बयान हो सके तो एसआई या उससे ऊपर के रैंक की महिला पुलिस अधिकारी द्वारा ही दर्ज किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने जोर देते हुए कहा, “ऐसे मामलों को संभालने वाले पुलिसकर्मियों को सही ट्रेनिंग दी जानी चाहिए और उनकी सही ट्रेनिंग के लिए समय-समय पर संवेदनशीलता बढ़ाने वाले प्रोग्राम आयोजित किए जाएं। पुलिस को यह भी पक्का करने चाहिए कि रेप पीड़िताओं को एक दोस्ताना माहौल मिले, ताकि वे बेझिझक के सच बता सकें। बयान दर्ज करते समय उन पर जबरदस्ती या दबाव न डाला जाए।”
कोर्ट ने लड़कियों/महिलाओं के लिए खुद की रक्षा के लिए फिजिकल ट्रेनिंग की जरूरत को जरूरी बताया। हालांकि “समग्र शिक्षा योजना” के तहत “रानी लक्ष्मीबाई आत्मरक्षा प्रशिक्षण (रक्षा)” कार्यक्रम, “भारत के प्रमुख इंटीग्रेटेड स्कूल एजुकेशन प्रोग्राम” के अंतर्गत आत्मरक्षा प्रशिक्षण की सुविधा देता है।
रेप से पैदा हुए बच्चों के लिए पुनर्वास और शिक्षा
इसके अलावा कोर्ट ने कहा, संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत राज्य छह से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना चाहिए।
इसके अलावा, बच्चों का नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 भी 6-14 वर्ष के आयु वर्ग के सभी बच्चों के लिए नि:शुल्क और शिक्षा को अनिवार्य बनाता है, वंचित समूहों और कमजोर पृष्ठभूमि के बच्चों को सुरक्षा प्रदान करता है। इसलिए राज्य सरकार को हर जिले में नोडल अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश दिया गया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बलात्कार की घटनाओं से पैदा हुए बच्चों को बारहवीं कक्षा तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान की जाए।
कोर्ट ने कहा कि नोडल अधिकारी यह भी सुनिश्चित करेंगे कि जो मेधावी छात्र बाद में आईआईटी, एनआईटी, एआईआईएम या आईआईएम इत्यादि जैसे प्रमुख सरकारी संस्थानों में चुने जाते हैं, उन्हें राज्य सरकार द्वारा छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है। साथ ही नोडल अधिकारी इस कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुपालन की निगरानी भी करेगा, और यदि ऐसे बच्चों को किसी भी कठिनाई का सामना करना पड़ता है, तो वह इस मामले को सचिव, स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग, झारखंड सरकार को सूचित करेगा, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बिना किसी अनुचित देरी के इसका समाधान किया जाए।
समय पर ट्रायल के लिए निर्देश
कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों के लिए कहा, “पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया जाता है कि वे रेप के मामलों की शुरुआती जांच पंद्रह दिनों के अंदर पूरी करें। रेप के मामले की जांच, संबंधित पुलिस स्टेशन के ऑफिसर-इन-चार्ज द्वारा जानकारी दर्ज करने की तारीख से दो महीने के अंदर पूरी हो जानी चाहिए। पीड़िताओं को ट्रेंड वकीलों द्वारा तुरंत कानूनी मदद दी जानी चाहिए जो पीड़ितों के साथ पूरी संवेदनशीलता के साथ बातचीत करेंगे, न कि सिर्फ क्लाइंट के तौर पर। उन्हें पीड़िताओं को गाइड करना चाहिए कि वे अलग-अलग तरह की मदद कैसे पा सकते हैं, जैसे कि साइकोलॉजिकल, इमोशनल काउंसलिंग या खास एजेंसियों से मेडिकल मदद। घटना के 24 घंटे के अंदर POCSO एक्ट के तहत पीड़ितों को तुरंत देखभाल और सुरक्षा दी जानी चाहिए, जिसमें उन्हें शेल्टर होम में भर्ती कराना और उनका मेडिकल एग्जामिनेशन शामिल है।”
राज्य को कोर्ट ने जारी किया निर्देश
कोर्ट ने झारखंड के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया कि वे BNSS, 2023 की धारा 173 के प्रावधानों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करें। इसके लिए, वे सभी पुलिस स्टेशनों को जरूरी निर्देश जारी करें और पालन की समय-समय पर निगरानी भी करें। अगर कोई पुलिस अधिकारी इन निर्देशों का पालन करने में विफल रहता है, तो ऐसे दोषी अधिकारी के खिलाफ कानून के अनुसार दंडात्मक और विभागीय कार्रवाई शुरू करने के लिए उचित कदम उठाए जाएंगे।
आगे कोर्ट ने कहा, “राज्य सरकार को यह भी निर्देश दिया गया है कि वह पुलिस कर्मियों के लिए समय-समय पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करे, ताकि ‘ज़ीरो FIR’ से जुड़े कानूनी आदेशों का प्रभावी ढंग से पालन हो सके। झारखंड सरकार के महिला, बाल विकास और सामाजिक सुरक्षा विभाग के सचिव को निर्देश दिया गया है कि वे ‘वन-स्टॉप सेंटर्स’ में मौजूद सभी कमियों और खामियों को बिना किसी देरी के दूर करें, जैसा कि विद्वान एमिकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) ने बताया है। उक्त विभाग द्वारा एक महिला-प्रधान समिति का गठन किया जाएगा। यह समिति ‘वन-स्टॉप सेंटर्स’ के कामकाज से जुड़ी शिकायतें प्राप्त करेगी और सेवाओं की पर्याप्तता व गुणवत्ता का आकलन करके इन सेंटर्स के संचालन की निगरानी करेगी, ताकि पीड़ितों को केंद्र में रखकर सेवाएँ दी जा सकें।”
कोर्ट ने कहा, “झारखंड सरकार के महिला, बाल विकास और सामाजिक सुरक्षा विभाग को निर्देश दिया जाता है कि वे महिला पीड़ितों के लिए बने शेल्टर होम/पुनर्वास केंद्रों के उद्देश्य, स्थान और संपर्क विवरण का सभी संचार माध्यमों से व्यापक और नियमित रूप से प्रचार-प्रसार करें। झारखंड सरकार के स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग को निर्देश दिया जाता है कि वे हर जिले में नोडल अधिकारी नियुक्त करें ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बलात्कार की घटनाओं से पैदा हुए बच्चों को 12वीं कक्षा तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा मिले।”
महिला ने दायर की थी याचिका
यह मामला एक महिला द्वारा दायर PIL से शुरू हुआ, जिसमें रेप सर्वाइवर्स की सुरक्षा और उनके पुनर्वास के लिए कई निर्देश देने की मांग की गई थी। इसमें संबंधित अधिकारियों को ‘ज़ीरो FIR’ दर्ज करने का निर्देश देना शामिल था, चाहे घटना किसी भी अधिकार क्षेत्र में हुई हो, और बिना किसी देरी या भौगोलिक सीमा के उसे सही पुलिस स्टेशन में ट्रांसफर करना भी शामिल था।
महिला ने याचिका में सर्वाइवर्स के लिए रहने की जगह और मुआवजे की कमी, जांच और ट्रायल में देरी, मीडिया द्वारा पीड़ितों की पहचान उजागर करने, ‘टू-फिंगर टेस्ट’ बंद किए जाने, और सर्वाइवर्स व रेप की घटनाओं से पैदा हुए बच्चों के लिए शिक्षा और पुनर्वास सहायता की जरूरत जैसे मुद्दों पर चिंता जताई गई थी।
रेप सर्वाइवर्स के प्रति संवेदनशीलता को देखते हुए, उन्होंने संबंधित पुलिसकर्मियों को निर्देश देने की मांग की कि वे रेप पीड़ितों के साथ मानवीय भावना और बिना उत्पीड़न वाला व्यवहार करें, साथ ही आरोपियों से उनकी सुरक्षा करते हुए उनके मामलों की समयबद्ध जांच सुनिश्चित करें।
PIL पर कोर्ट ने लिया था स्वतः संज्ञान
कोर्ट ने 24 सितंबर, 2025 को इस PIL के आधार पर मामले का स्वतः संज्ञान लिया और उन्हें एक इंटरवेनर (हस्तक्षेपकर्ता) के तौर पर कोर्ट की मदद करने की इजाज़त दी गई। झारखंड लीगल सर्विस अथॉरिटी (JHALSA) की ओर से पेश वकील अतानु बनर्जी ने भी इस PIL में उठाए गए मुद्दों पर सुझावों के नोट दाखिल किए हैं।
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि, अन्य बातों के अलावा, अभी रांची जिले में 18 साल से अधिक उम्र की यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं/सर्वाइवर्स के लंबे समय तक रहने के लिए कोई शेल्टर होम चालू नहीं है।
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कलकत्ता हाई कोर्ट ने शुक्रवार को पुलिस द्वारा आरोपियों को कमर में रस्सी बांधकर सार्वजनिक रूप से घुमाने की कथित प्रथा पर चिंता व्यक्त की और कहा कि राज्य को व्यक्तियों को गिरफ्तार करने और उन पर मुकदमा चलाने का अधिकार है, लेकिन वह उन्हें अपमानित नहीं कर सकता। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
