सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सबरीमाला मंदिर में महिलओं की एंट्री को लेकर सुनवाई हुई। सबरीमाला मंदिर का प्रबंधन करने वाले त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (टीडीबी) के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सवाल उठाया कि क्या कोई बाहरी व्यक्ति किसी धर्म या संप्रदाय की प्रथा को जनहित याचिका के जरिए चुनौती दे सकता है।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि धर्म करोड़ों लोगों की आस्था है। कोई तीसरा व्यक्ति सीधे अनुच्छेद 32 के तहत आकर इसे बदल नहीं सकता। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि सबसे मुश्किल यह तय करना है कि करोड़ों लोगों की आस्था गलत है।
सबरीमाला मामले की सुनवाई नौ जजों की बेंच कर रही है। जिसमें एक मात्र महिला जज जस्टिस नागरत्ना है। सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि सामाजिक कल्याण और सुधार के नाम पर आप धर्म को पूरी तरह से खत्म नहीं कर सकते। हालांकि, जस्टिस नागरत्ना ने पीआईएल को लेकर कहा कि प्रथा मानने वाला इंसान कभी अपनी ही प्रथा पर सवाल नहीं उठाएगा। इसी प्रकार, जस्टिस सुंदरेश ने पूछा कि क्या न्यायालय लाखों लोगों के प्रतिनिधियों की सुनवाई किए बिना ऐसे प्रश्नों का निर्णय कर सकते हैं।
सुनावाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि करोड़ों लोगों की आस्था गलत, यह तय करना सबसे मुश्किल है। वहीं, सिंघवी ने कहा कि जनहित याचिका धार्मिक प्रथाओं की व्याख्या या उन्हें गलत ठहराने का माध्यम नहीं बननी चाहिए।
सीजेआई ने कहा कि जनहित याचिका की सुनवाई के लिए कुछ सामान्य सिद्धांत पहले से तय हैं। सिंघवी ने कहा कि लेकिन अनुच्छेद 25 और 26 के मामलों में मानक (सीमा) कहीं ज्यादा सख्त होना चाहिए। धर्म करोड़ों लोगों की आस्था है। कोई तीसरा व्यक्ति सीधे अनुच्छेद 32 के तहत आकर इसे बदल नहीं सकता।
जस्टिस सुंदरेश कि क्या अदालत करोड़ों लोगों को सुने बिना फैसला कर सकती है? इसी तरह जस्टिस नागत्ना ने कहा कि ऐसी PIL को मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि याचिकाकर्ता खुद उस धर्म का मानने वाला नहीं है।
सीजेआई ने कहा कि सबसे मुश्किल काम है यह तय करना कि करोड़ों लोगों की आस्था गलत है। सिंघवी ने कहा कि और यही PIL में हो रहा है।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि प्रथा मानने वाला कभी उसके खिलाफ सवाल नहीं उठाएगा।
सिंघवी ने कहा कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति, जो किसी धर्म या संप्रदाय से जुड़ा नहीं है और उसकी प्रथा को जनहित याचिका (PIL) के जरिए चुनौती दे सकता है? उन्होंने कहा कि मैंने 23 फैसलों का चार्ट दिया है। इन सभी में अनुच्छेद 25 और 26 के मामले, उसी धर्म के मानने वालों ने उठाए हैं। यानी- जिसका अधिकार प्रभावित हुआ, वही चुनौती देने आया।
उन्होंने कहा कि इस केस में स्थिति उलटी हो गई है। एक व्यक्ति (जो उस धर्म का नहीं है) चुनौती दे रहा है। सही तरीका क्या होता है- मैं (व्यक्ति) या कोई संप्रदाय, अपने अधिकार के उल्लंघन पर कोर्ट जाते हैं। फिर कोर्ट फैसला करता है। लेकिन यहां ऐसा नहीं है। यहां कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसका अनुच्छेद 25 या 26 का अधिकार प्रभावित हुआ हो। कोई कानून भी नहीं है। एक पीआईएल याचिकाकर्ता आकर कह रहा है कि मुझे लगता है यह धार्मिक प्रथा गलत है।
अब स्थिति यह हो गई कि जिसके अधिकार हैं (धर्म मानने वाले) वो चुनौती नहीं दे रहा, सरकार भी प्रतिवादी नहीं है, बल्कि हम और सरकार- दोनों ही जनहित याचिका के खिलाफ खड़े हैं। यह पूरे सिस्टम को उल्टा कर देता है।
जस्टिस सुंदरेश ने कहा कि यह बात जस्टिस नागरत्ना भी कह चुकी हैं। जस्टिस नागरत्ना कि लेकिन मानने वाला तो कभी अपनी ही प्रथा पर सवाल नहीं उठाएगा। फिर याचिकाकर्ता कौन होगा?
केरल हाईकोर्ट ने 1991 में सबरीमाला में 10 से 50 साल की महिलाओं की एंट्री पर बैन लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इसे भेदभावपूर्ण बताते हुए बैन हटा दिया। इसके बाद दायर पुनर्विचार याचिकाओं के आधार पर 7 महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न तय किए गए हैं, जिन पर अब बहस हो रही है।
सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई है। पहले तीन दिन, नौ अप्रैल तक सुनवाई हुई। इस दौरान भी महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखी गईं। केंद्र सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के बच्चे केंद्र सरकार के वकील हैं- अरविंद केजरीवाल
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आबकारी नीति मामले में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को मामले से अलग करने की अपनी याचिका को मजबूत करने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट में एक नया हलफनामा दायर किया है। इस मामले में केजरीवाल खुद आरोपी हैं। पढ़ें पूरी खबर।
