बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा के इस्तीफे को लेकर मांग तेज होती जा रही है। अब सीनियर वकील और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के सह-अध्यक्ष वाईआर सदाशिवा रेड्डी (BCI CO-Chair YR Sadasiva Reddy) ने बीसीआई अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा को पत्र लिखकर उनके तत्काल इस्तीफे की मांग की है।

22 अगस्त को लिखे एक पत्र में वाईआर सदाशिवा रेड्डी ने मनन मिश्रा से पंद्रह दिनों के अंदर बीसीआई अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के लिए कहा है। पत्र में कहा गया है कि मिश्रा की अध्यक्षता में बीसीआई अपेक्षित मानकों से भटक गया है।

वाईआर सदाशिवा रेड्डी ने कहा, “बार काउंसिल ऑफ इंडिया किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है। इसके पास मौजूद हर रुपया ट्रस्ट के रूप में रखा जाता है। यह जो भी शक्ति प्रयोग करती है, वह संसद द्वारा बार के हित में प्रदत्त शक्ति है, न कि अध्यक्ष के पद पर आसीन व्यक्ति के हित में। “

उन्होंने बीसीआई की एक विशेष बैठक बुलाने और बीसीआई के खातों के साथ-साथ मनन मिश्रा के अध्यक्षीय कार्यकाल के दौरान स्थापित “बीसीआई ट्रस्ट पर्ल -फर्स्ट” नामक ट्रस्ट के स्वतंत्र ऑडिट की भी मांग की है।

इसके अलावा, रेड्डी ने यह भी मांग की है कि बीसीआई द्वारा लॉ कॉलेजों से अनुमोदन प्राप्त करने के लिए किसी भी प्रकार का और भुगतान स्वीकार करने पर रोक लगाई जाए।

यह कदम मनन मिश्रा द्वारा एक पत्र जारी करने के बाद आलोचनाओं का सामना करने के कुछ ही समय बाद आया है। जिसमें उन्होंने चेतावनी दी थी कि हैदराबाद के NALSAR के वे छात्र जो भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की विधि विद्यालय के दीक्षांत समारोह में भागीदारी का विरोध करने वाले अभियान के पीछे पाए जाएंगे, उन्हें अधिवक्ता के रूप में नामांकन से वंचित कर दिया जाएगा।

इस निर्देश और इस मामले की प्रस्तावित जांच को कुछ घंटों बाद वापस ले लिया गया। रेड्डी ने मिश्रा के इस्तीफे की मांग में इसी घटना का हवाला दिया है।

रेड्डी के पत्र के अनुसार, विश्वविद्यालय के स्नातक बैच के नामांकन पर रोक लगाने वाला 13 अगस्त का निर्देश बार काउंसिल ऑफ इंडिया के समक्ष सामग्री रखे बिना, काउंसिल द्वारा इस पर विचार-विमर्श किए बिना और इस काउंसिल के किसी भी प्रस्ताव द्वारा इसे अधिकृत किए बिना जारी किया गया था।

रेड्डी के पत्र में कहा गया है, “भले ही खेद व्यक्त करने में देरी हुई हो, लेकिन यह मुद्दा नहीं है। मुद्दा यह है कि अध्यक्ष पद का दुरुपयोग कानून के छात्रों के पूरे स्नातक बैच को उन युवा पुरुषों और महिलाओं को जिनके पास कोई शक्ति और कोई आवाज नहीं थी। पेशे से बहिष्कृत करने की धमकी देने के लिए किया गया, क्योंकि उन्होंने एक राय रखी थी।”

रेड्डी के पत्र में उल्लिखित अन्य आधारों में बीसीआई में अनियमित नियुक्तियों के आरोप शामिल हैं। रेड्डी का दावा है कि बीसीआई के कई कर्मचारी मिश्रा से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें बिना किसी विज्ञापन या पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रिया के भर्ती किया गया है।

पत्र में निधि के दुरुपयोग को लेकर भी चिंता जताई गई

पत्र के अनुसार, मिश्रा द्वारा चुने गए न्यासियों के साथ “बीसीआई ट्रस्ट पर्ल – फर्स्ट” नामक एक नया ट्रस्ट 2020 में पंजीकृत किया गया था। रेड्डी का आरोप है कि कई बीसीआई सदस्यों की आपत्तियों के बावजूद, इस ट्रस्ट को बीसीआई फंड से लगभग 150 करोड़ रुपये का हस्तांतरण प्राप्त हुआ।

रेड्डी ने कहा कि बाद में इस ट्रस्ट को कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों, जिनमें पूर्व न्यायाधीश भी शामिल थे। उनसे जोड़ा गया ताकि इसे वह सम्मान दिलाया जा सके जिसका यह अपनी स्थापना के तरीके को देखते हुए हकदार नहीं था। पत्र में कहा गया है कि इसके साथ ही पूर्ववर्ती बीसीआई ट्रस्ट निष्क्रिय हो गया है।

पत्र में आगे कहा गया, “मुझे अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के ऐसे किसी प्रावधान की जानकारी नहीं है जो किसी वैधानिक नियामक (बीसीआई) की निधि को उसके स्वयं के अध्यक्ष द्वारा पंजीकृत निजी ट्रस्ट को हस्तांतरित करने की अनुमति देता हो। बार काउंसिल के किसी भी सदस्य ने ट्रस्ट विलेख की प्रति नहीं देखी है।”

रेड्डी ने आगे दावा किया है कि उन्हें शिकायतें मिली हैं कि बीसीआई से अनुमोदन या नवीनीकरण चाहने वाले लॉ कॉलेजों को बीसीआई ट्रस्ट पर्ल को 25 लाख रुपये से लेकर 1 करोड़ रुपये तक का योगदान देना पड़ता है।

पत्र में आगे कहा गया है कि यदि ये आरोप सही हैं तो यह अत्यंत गंभीर मामला है। पत्र में यह भी कहा गया है कि विधि पाठ्यक्रमों के लिए अनुमोदन या अनुमोदन के नवीनीकरण की बीसीआई की शक्ति का अर्थ धन जुटाने का लाइसेंस नहीं है। रेड्डी ने आगे कहा कि ऐसे कृत्यों के परिणाम आज भारतीय विधि शिक्षा की स्थिति से स्पष्ट हैं। इसमें आगे कहा गया है कि ऐसे कॉलेज जिन्हें कभी मंजूरी ही नहीं मिलनी चाहिए थी, वे साल दर साल चलते रहते हैं और हजारों युवाओं को ऐसी डिग्री बेच दी जाती है जो उन्हें किसी काम की नहीं होती।

पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि बीसीआई द्वारा संचालित शिक्षण संस्थानों में प्रमुख प्रशासनिक पद मिश्रा के परिवार के सदस्यों के पास हैं। रेड्डी ने आगे कहा कि पूर्ण परिषद के समक्ष विचार-विमर्श किए बिना जारी किए गए आदेशों के माध्यम से राज्य बार परिषदों के भीतर गुटबाजी को बढ़ावा दिया गया है।

पत्र में मनन मिश्रा के 2012 से लगातार अध्यक्ष पद पर बने रहने का उल्लेख किया गया है, जो लगातार चौदह वर्षों तक रहा है। जिसमें 2025 में फिर से हासिल किया गया एक कार्यकाल भी शामिल है, जो संसद द्वारा इस पद के लिए निर्धारित रोटेशनल सिद्धांत से हटकर है।

पत्र में इस पहलू पर यह बात कही गई है कि आप 2012 से लगातार उस पद पर बने हुए हैं। यह अभूतपूर्व है। जब इस पद के लिए चुनाव होते हैं, तो व्यवस्था इस प्रकार की जाती है कि परिणाम पहले से ही तय होता है। चौदह वर्षों तक एक ही व्यक्ति के एक पद पर बने रहने वाला निर्वाचित पद, वास्तविक अर्थों में, निर्वाचित पद नहीं रह जाता।

रेड्डी के पत्र में बीसीआई कार्यालय के बाहर मिश्रा के इस्तीफे की मांग को लेकर अधिवक्ताओं द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शनों और राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों की छात्र बार परिषदों द्वारा अध्यक्ष के साथ मंच साझा करने से इनकार करने को भी इस बात के संकेत के रूप में उठाया गया है कि बार का बीसीआई में विश्वास खो गया है।

रेड्डी ने मिश्रा से इस्तीफा देने का आग्रह करते हुए अपने पत्र में आगे लिखा, “मेरे मन में आपके प्रति कोई व्यक्तिगत द्वेष नहीं है। मैंने इस परिषद में आपके साथ एक दशक तक सेवा की है। इस संस्था को इतने लंबे समय तक भीतर से देखने के कारण ही मैं पूर्ण विश्वास के साथ कह सकता हूं कि जब तक आप अध्यक्ष पद पर बने रहेंगे, यह संस्था पुनर्जीवित नहीं हो पाएगी। इस देश की बार एसोसिएशन अपने ही परिषद से जो कुछ प्राप्त कर रही है, उससे कहीं बेहतर की हकदार है। मैं आपसे निवेदन करता हूं कि इसे वह अवसर प्रदान करें।

इसी बीच, शुक्रवार को एक वकील द्वारा सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर मिश्रा के एक दशक से अधिक समय तक लगातार बीसीआई अध्यक्ष बने रहने को चुनौती दी गई है। इस याचिका पर अभी अदालत में सुनवाई होनी बाकी है।

मनन मिश्रा को BCI चेयरमैन पद से हटाने की मांग, सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल

बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा को पद से हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। याचिका में उनके 10 साल से ज्यादा पद पर बने रहने को लेकर सवाल खड़ा किया गया है। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट की वकील योगमाया एमजी द्वारा दायर याचिका में मनन मिश्रा के बीसीआई अध्यक्ष के रूप में लगातार बने रहने को चुनौती दी गई है। जिसमें तर्क दिया गया है कि बीसीआई नियम 12(2) अध्यक्ष के कार्यकाल को दो वर्ष तक सीमित करता है और अप्रैल 2025 की राजपत्र अधिसूचना द्वारा उनके कार्यकाल को 2030 तक बढ़ाना कानून के विपरीत है। पढ़ें पूरी खबर।