दिल्ली की एक अदालत ने रविवार शाम को AI Summit में विरोध प्रदर्शन को लेकर गिरफ्तार किए गए नौ इंडियन यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को जमानत दे दी। पटियाला हाउस कोर्ट के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी रवि ने कृष्ण हरि, नरसिम्हा यादव, कुंदन कुमार यादव, अजय कुमार सिंह, जितेंद्र सिंह यादव, राजा गुर्जर, अजय कुमार विमल उर्फ बंटू, सौरभ सिंह और अरबाज खान को रिहा करने का आदेश दिया।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, अपने आदेश में जज ने कहा कि युवा कांग्रेस का विरोध राजनीतिक असहमति के बराबर था, न कि बार-बार की जाने वाली हिंसा या संगठित अपराध था। कोर्ट ने कहा कि यह विरोध प्रदर्शन ज्यादा से ज्यादा एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान प्रतीकात्मक राजनीतिक आलोचना का रूप था। नेतृत्व की छवियों वाली टी-शर्ट, सांप्रदायिक/क्षेत्रीय रंग से रहित गैर-भड़काऊ नारे और क्षणिक सभा। संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या प्रतिनिधियों में दहशत फैलने का कोई सबूत नहीं मिला। सुरक्षाकर्मियों के साथ सही तरीके से सभी लोग बाहर निकले।
जज रवि ने आगे कहा कि बिना किसी जांच की आवश्यकता के लंबे समय तक विचाराधीन हिरासत में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।
इंडियन यूथ कांग्रेस के सदस्यों ने 20 फरवरी को भारत मंडपम में आयोजित इंडिया AI समिट के अंदर विरोध प्रदर्शन किया। उनमें से कुछ ने अपनी कमीजें उतारकर ऐसी टी-शर्टें दिखाईं जिन पर “प्रधानमंत्री समझौता कर चुके हैं” जैसे नारे और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की आलोचना लिखी थी। साथ ही पीएम मोदी और सरकार की नीतियों के खिलाफ नारे लगाए।
पुलिस ने इस मामले में अब तक चौदह लोगों को गिरफ्तार किया है और उन पर सुरक्षा में सेंध लगाने और घटनास्थल पर कथित तौर पर राष्ट्र-विरोधी नारे लगाने का आरोप लगाया है। न्यायालय ने गौर किया कि अभियुक्त के विरुद्ध लगाए गए किसी भी आपराधिक प्रावधान में सात वर्ष से अधिक कारावास की सजा का प्रावधान नहीं है। न्यायालय ने पुलिस के इस तर्क को खारिज कर दिया कि सजाएं क्रमिक रूप से चलाई जा सकती हैं।
अदालत ने कहा कि पुलिस का तर्क इस अंतरिम जमानत के मोड़ पर न्यायशास्त्रीय आधार से रहित है, जहां न्यायिक दृष्टि संभावित दोषसिद्धि के भ्रम पर नहीं बल्कि मुकदमे से पहले की स्वतंत्रता की कठोर वास्तविकताओं पर टिकी है।
जज ने आगे कहा कि किसी भी अनिवार्य आवश्यकता से रहित और निरंतर जांच संबंधी मांगों से मुक्त, पूर्व-परीक्षण हिरासत अनिवार्य रूप से दोषसिद्धि से पहले एक अवैध निवारक दंड में परिवर्तित हो जाती है। यह एक गंभीर विचलन है जो आपराधिक न्यायशास्त्र के मूलभूत सिद्धांतों के साथ मौलिक रूप से विरोधाभासी है, जो स्वतंत्रता को मार्गदर्शक मानदंड और कारावास को सीमित अपवाद के रूप में महत्व देते हैं।
अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया था कि आरोपियों द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शनों ने एक हाई-प्रोफाइल वैश्विक कार्यक्रम को बाधित करके राष्ट्रीय सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और राष्ट्रीय अखंडता के लिए खतरा पैदा किया। यह बताया गया कि जांच अभी भी जारी है और आरोपी द्वारा सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने का खतरा है।
हालांकि, कार्यकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकीलों ने तर्क दिया कि सभी कथित अपराधों में सात साल से कम की सजा का प्रावधान है, जिससे यह मामला सतेंद्र कुमार अंतिल के तहत श्रेणी ए में आता है, जहां जमानत मिलना आम बात है।
यह कहा गया कि विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण, प्रतीकात्मक राजनीतिक असहमति थी। जिसमें कोई हिंसा, क्षति या धमकी नहीं थी और यह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) और 19(1)(बी) के तहत संरक्षित है। मामले पर विचार करने के बाद कोर्ट ने नौ कार्यकर्ताओं को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।
क्रिकेटर का उदाहरण देकर CJI सूर्य कांत ने वकीलों को दी सलाह
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने शुक्रवार को युवा वकीलों के लिए पेशेवर विशेषज्ञता के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि वकील पेशे के हर पहलू में माहिर नहीं हो सकते, ठीक उसी तरह जैसे क्रिकेटरों से टी20 मैच में सभी भूमिकाएं निभाने की अपेक्षा नहीं की जाती है। पढें पूरी खबर।
