हैदराबाद की नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के क्रिमिनल लॉ के वकीलों के एक ग्रुप स्क्वायर सर्कल क्लिनिक ने पिछले दस सालों के मौत की सजा के आंकड़ों की स्टडी की, जिसमें उन्होंने पाया निचली अदालतों से मौत की सजा पाने वाले अधिकतर कैदियों को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से बरी किया गया, ऐसे में निचली अदालतों में गलत या अनुचित दोषसिद्धि का एक पैटर्न दिख रहा है।

विगत 10 वर्षों में देशभर की निचली अदालतों ने 1310 लोगों को मौत की सजा दी, लेकिन हाई कोर्ट ने केवल 70 मामलों को ही बरकरार रखा, जो बेहद कम संख्या है। वहीं, इन 70 मौत की सजाओं में से सुप्रीम कोर्ट ने केवल 38 मामलों पर फैसला सुनाया और किसी को भी बरकरार नहीं रखा। इसकी रिपोर्ट बुधवार को जारी की जाएगी।

2016 के बाद बढ़ी संख्या

31 दिसंबर तक 574 लोग मौत की सजा का इंतजार कर रहे थे। रिपोर्ट में कहा गया, यह 2016 के बाद किसी कैलेंडर वर्ष के अंत में मौत की सजा पाने वाले लोगों की सबसे बड़ी संख्या है, जबकि अपीलीय अदालतें मुकदमे के दौरान दी गई अधिकतर मौत की सजाओं को पलट रही या कम कर रही हैं। केवल 2025 में, देश भर की सत्र अदालतों ने 94 मामलों में 128 लोगों को मौत की सजा सुनाई।

अधिकतर लोगों को किया गया बरी

पिछले 10 वर्षों में, मौत की सजा पाए 364 लोगों को बाद में अपीलीय न्यायालयों द्वारा बरी कर दिया गया। अकेले 2025 में हाई कोर्ट ने अपने निपटाए मामलों में से 25 फीसदी से अधिक में मौत के मामलों को बरी में बदल दिया है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने द्वारा सुने गए मामलों में से आधे से अधिक में आरोपियों को बरी कर दिया।

बीते कुछ सालों में, सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा वाले फैसले के लिए उचित प्रक्रिया और प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों पर बार-बार जोर दिया। 2022 में कोर्ट ने निर्देश दिया था कि निचली अदालतों को मौत की सजा देने से पहले तीन विशेष रिपोर्टों- मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन, परिवीक्षा अधिकारी की रिपोर्ट और कारागार आचरण रिकॉर्ड को मंगवाना और उन पर विचार करना जरूरी है।

रिपोर्ट में क्या कहा गया?

निचली अदालत द्वारा मौत की सजा- 1310
हाई कोर्ट द्वारा सुने गए मौत की सजा के मामले- 842
हाई कोर्ट द्वारा मौत की सजा को बरकरार रखा गया- 70
हाई कोर्ट द्वारा मौत की सजा के मामले में बरी किए गए लोग- 258
सुप्रीम कोर्ट द्वारा मौत की सजा के मामलों पर दिए गए फैसले 38
सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा के मामलों को बरकरार रखा गया- 0

मृत्युदंड संबंधी आंकड़े- 10 सालों का अवलोकन (2016-2025)

सुप्रीम कोर्ट ने क्या दिए थे गाइडलाइन?

अगस्त 2025 में, वसंत संपत दुपारे बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मौत की सजा की सुनवाई संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का एक अनिवार्य घटक है। प्रभावी रूप से, कोर्ट ने कहा कि 2022 के गाइडलाइन का पालन न करने वाली सुनवाई को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा, इसके चलते कोर्ट ने उन मृत्युदंड प्राप्त व्यक्तियों के लिए सजा सुनाने की प्रक्रिया को फिर से शुरू किया, जिन्होंने अपील प्रक्रिया पूरी कर ली थी।

2023 से सुप्रीम कोर्ट ने नही दी फांसी की सजा

लगातार वर्ष 2023 से 2025 तक सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी मृत्युदंड मामले की पुष्टि नहीं की है और इसके विपरीत, बरी होने की संख्या में तेजी से बढ़े हैं। 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने द्वारा निपटाए गए मामलों में से 50 फीसदी से अधिक मामलों में आरोपियों को बरी कर दिया, जो 2016 के बाद से बरी होने की सबसे अधिक संख्या है।

हाईकोर्ट के क्या रहे आंकड़े?

हाईकोर्ट लेवल पर भी 10 सालों के आंकड़े भी कुछ इसी तरह हैं। 2016 से 2025 के बीच हाईकोर्ट ने मृत्युदंड मामलों में सजा बरकरार रखने की तुलना में चार गुना अधिक लोगों को बरी किया है। 2025 में हाई कोर्ट ने 131 व्यक्तियों से जुड़े मामलों का निपटारा किया जिनमें से लगभग 90 फीसदी बरी हुए, सजा कम हुई या पुनर्विचार के माध्यम से रद्द किया गया।

रिपोर्ट में दी गई चेतावनी

वकीलों के रिपोर्ट में चेतावनी दी गई कि इन परिणामों को एक गलती मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। रिपोर्ट में कहा गया, “गलत, त्रुटिपूर्ण या अनुचित दोष सिद्धि… भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में आकस्मिक या अप्रत्याशित घटनाएं नहीं हैं।”

निचली अदालतों में नहीं है सुधार

हालांकि, अभी तक सुधार निचली अदालत लेवल पर सुधार नहीं दिख रहा है। 2025 में निचली अदालतें 83 में से 79 मामलों में 2022 के सुप्रीम कोर्ट के गाइडलाइन का पालन करने में विफल रहे। रिपोर्ट में इसे 95.18 फीसदी गैर-अनुपालन दर के रूप में दर्ज किया गया है।

इस रिपोर्ट में बताया गया कि 2025 में 18 मामलों में, दोष सिद्ध होने के उसी दिन सजा दी गई। दो-तिहाई से अधिक मामलों में, सजा सुनाने की सुनवाई पांच दिनों के भीतर हुई। आगे रिपोर्ट में कहा गया कि इस तरह की समय सीमा राज्यों को आरोपी के मानसिक स्वास्थ्य, जेल में व्यवहार और व्यक्तिगत इतिहास से संबंधित रिपोर्ट मिलने में काफी बाधा डालती है। साथ ही बचाव पक्ष की सजा कम करने वाले सबूतों को पेश करने की क्षमता में भी रुकावट पैदा करती है।

किन राज्यों से लिए गए आंकड़े?

यह रिपोर्ट मौत की सजा पाने वाले कैदियों की संख्या कुछ ही राज्यों में केंद्रित है। इसमें उत्तर प्रदेश की संख्या सबसे अधिक है, उसके बाद गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, केरल और कर्नाटक का नंबर आता है। 2025 में मौत की सजा पाने वाले कैदियों में महिलाओं की संख्या 4.18% थी। पिछले एक दशक में, निचली अदालतों द्वारा दी गई मृत्युदंड की सजाओं में से अधिकांश साधारण हत्या और यौन अपराधों से जुड़ी हत्याओं के मामलों में थीं। आगे पढ़िए 30 साल बाद हाईकोर्ट ने विधवा को दिलाए 4 लाख रुपये