‘क्या टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी इतने प्रभावशाली हैं कि अगर उन्हें गिरफ्तारी या हिरासत में पूछताछ से अंतरिम सुरक्षा प्रदान की जाती है तो वे चल रही पुलिस जांच में बाधा डाल सकते हैं?’ कलकत्ता हाई कोर्ट ने यह सवाल तब उठाया जब कहा गया कि अगर अभिषेक बनर्जी को अंतरिम सुरक्षा दी जाती है तो वह पुलिस जांच में दखल दे सकते हैं।

हाई कोर्ट अभिषेक बनर्जी की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें उन्होंने दावा किया था कि 4 मई को भाजपा सरकार के सत्ता में आने के तुरंत बाद उनके खिलाफ राजनीतिक रूप से प्रेरित कई एफआईआर दर्ज की गईं।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस सौगता भट्टाचार्य ने सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से टिप्पणी की कि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक परिदृश्य बदल चुका है। क्योंकि टीएमसी की जगह अब अलग राजनीतिक दल सत्ता में है। इसी को ध्यान में रखते हुए जज ने पूछा कि क्या अभिषेक बनर्जी अब भी इतने प्रभावशाली हैं कि यदि उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर में उन्हें और अंतरिम सुरक्षा दी जाती है तो वे जांच को प्रभावित कर सकते हैं।

जज ने एक ऐसे मामले का भी जिक्र किया जिसमें अभिषेक बनर्जी के सांसद कार्यालय के रूप में इस्तेमाल की जा रही एक संपत्ति के खिलाफ विध्वंस कार्य शुरू किया गया था। इससे पहले कि उच्च न्यायालय ने सप्ताहांत में हस्तक्षेप करके इस कार्रवाई को रोक दिया।

जज बोले- अब हालात बदल गए हैं

न्यायाधीश ने पूछा, “अब हालात बदल गए हैं। इसलिए हिरासत में पूछताछ जरूरी नहीं है। राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव के कारण अब परिदृश्य बदल गया है। अगर वह इतने प्रभावशाली हैं, तो अमताला स्थित उनका कार्यालय क्यों ध्वस्त किया जा रहा है? क्या अदालत की समन्वय पीठ को हस्तक्षेप करना पड़ा (विध्वंस रोकने के लिए)? यह आपके इस दावे का समर्थन नहीं करता कि याचिकाकर्ता बहुत प्रभावशाली हैं। क्या किसी प्रभावशाली व्यक्ति का कार्यालय उसके निर्वाचन क्षेत्र में ध्वस्त किया जाता है?”

इसके जवाब में एडवोकेट जनरल सुरोजित नाथ मित्रा ने बताया कि उक्त संपत्ति बनर्जी की नहीं है। मित्रा ने इस दावे का भी खंडन किया कि संपत्ति अभिषेत बनर्जी से जुड़ी कंपनी लीप्स एंड बाउंड्स की है। उन्होंने आगे कहा कि उस स्थिति में भी लीप्स एंड बाउंड्स रविवार को मामले की सुनवाई कराने में सफल रही, जबकि राज्य के पास तैयारी के लिए पर्याप्त समय नहीं था।

हालांकि, न्यायाधीश ने कहा कि राज्य में राजनीतिक स्थिति बदल गई है। उन्होंने यह भी कहा कि अधिकारी कभी-कभी शुक्रवार शाम को बनर्जी के कार्यालय को ध्वस्त करने जैसी कार्रवाई शुरू कर देते हैं, जिससे अदालतों को राहत की मांग वाली याचिकाओं की सुनवाई के लिए हफ्ते में भी बैठना पड़ता है। अदालत ने कहा कि क्या वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था के दौर से पहले (बनर्जी से जुड़ी संपत्ति को गिराना) संभव था? मैं यह सवाल हर किसी से पूछ रहा हूं। इससे पता चलता है कि स्थिति बदल गई है। और शुक्रवार शाम को ही विध्वंस की कार्यवाही शुरू हो गई। कल के मामले की तरह, रैली के मामले की तरह। सभी कार्यवाही शुक्रवार शाम से शुरू की जा रही हैं। और अदालत को हफ्ते में भी बैठना पड़ता है।

टीएमसी नेता अभी भी एक प्रभावशाली व्यक्ति है- शिकायतकर्ता के वकील

इस बीच, अभिषेक बनर्जी के खिलाफ दर्ज एक एफआईआर में शिकायतकर्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील ने कहा कि टीएमसी नेता अभी भी एक प्रभावशाली व्यक्ति हैं। उन्होंने आगे कहा कि कुछ ही दिन पहले बनर्जी ने मीडिया में दिए गए बयानों के जरिए उन पर खुलेआम हमले किए थे। उन्होंने कहा कि 4 मई के बाद भी उनका प्रभाव बेहद बढ़ गया है। कृपया उन्हें अंतरिम सुरक्षा न दें, इससे जांच में बाधा आएगी और कोई भी आम आदमी उनके खिलाफ सबूत देने के लिए आगे नहीं आएगा। अगर यह बेहद प्रभावशाली व्यक्ति बाहर रहा तो शिकायतकर्ता को शिकायत वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने क्या कहा?

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने भी अभिषेक बनर्जी को किसी भी प्रकार की अंतरिम राहत दिए जाने का विरोध किया। राजू ने कहा कि यदि किसी एफआईआर में संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो उसे प्रारंभिक चरण में ही रद्द नहीं किया जा सकता। मैं एफआईआर से ही बता रहा हूं कि संज्ञेय अपराध कैसे सिद्ध होता है। प्रत्येक एफआईआर को ध्यान से देखें। अंतरिम आदेश पारित करने के लिए पहली आवश्यकता प्रथम दृष्टया मामला होना है। उसे प्रथम दृष्टया मामला सिद्ध करना होगा। वह अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकता था और दंडात्मक कार्रवाई न करने की प्रार्थना कर सकता था। (इसके बजाय) वह एफआईआर रद्द करने के लिए आया है। यदि रद्द करने का कोई मामला ही नहीं है, तो अंतरिम राहत का मामला कहां है? यदि संज्ञेय अपराध सिद्ध होता है, तो विलंब एफआईआर रद्द करने का आधार नहीं है।

अतिरिक्त अधिवक्ता जनरल बिलवादल भट्टाचार्य ने भी इस रुख का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि यदि न्यायालय अंतरिम सुरक्षा की शर्त के रूप में अभिषेक बनर्जी को जांच में सहयोग करने का निर्देश भी देता है, तो भी संभावना है कि टीएमसी नेता द्वारा इन शर्तों का ठीक से पालन किए जाने से पहले राज्य को न्यायालय में पुनः अपील करनी पड़ेगी।

एएजी ने कहा कि अदालत के आदेश के बावजूद, राज्य को आवाज का नमूना लेने में सहयोग करने के लिए उन्हें निर्देश देने हेतु एक आवेदन दायर करना पड़ा। मैं व्यावहारिक पहलू पर ध्यान दे रहा हूं। एक हफ्ते बाद, वह वापस आकर कहेंगे, ‘मैं सहयोग कर रहा हूं, अब वे मुझे परेशान कर रहे हैं।’ यह सिलसिला कभी नहीं रुकेगा। सहयोग सार्थक होना चाहिए। केस डायरी देखे बिना, माननीय न्यायाधीश (बनर्जी को संरक्षण देने वाला) कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं कर सकते। इसके जवाब मे न्यायाधीश ने कहा कि तो फिर आप अदालत में जाइए। हमें पहले से ही अनुमान नहीं लगाना चाहिए।

इसके बाद न्यायालय ने पहले के अंतरिम आदेश को आगे बढ़ाते हुए कहा कि जांच जारी रहने तक अभिषेक बनर्जी के खिलाफ तीन एफआईआर के संबंध में फिलहाल कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए। यह अंतरिम आदेश 31 अगस्त तक या अगले आदेश तक लागू रहेगा। अदालत ने इस बात पर भी अपना फैसला सुरक्षित रख लिया कि क्या बनर्जी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की याचिका पर अंतिम निर्णय लेने तक अंतरिम सुरक्षा जारी रहनी चाहिए या नहीं।

दर्ज एफआईआर की संख्या अब 16 हो गई है- अभिषेक बनर्जी के वकील ने कोर्ट से कहा

इस बीच, बनर्जी का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि बनर्जी के खिलाफ दर्ज एफआईआर की संख्या अब 16 हो गई है। उन्होंने कहा कि इन एफआईआर का केवल पहला पृष्ठ ही ऑनलाइन उपलब्ध है। उन्होंने न्यायालय से पुलिस को इन एफआईआर का पूरा विवरण, जिसमें शिकायतें भी शामिल हों, उपलब्ध कराने का निर्देश देने का आग्रह किया।

इसके बाद न्यायाधीश ने आदेश दिया किअगली तारीख से पहले संबंधित पुलिस प्राधिकरण को मौजूदा आपराधिक अभियोगों से संबंधित सभी एफआईआर की प्रतियां शिकायतों के साथ उपलब्ध कराने का निर्देश दिया जाता है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त को होगी।

अभिषेक बनर्जी का ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ अब सवालों के घेरे में, सेबाश्रय पर FIR से बढ़ी मुश्किल

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी के बहुचर्चित ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ पर सवाल उठने लगे हैं। उनके लोकसभा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए शुरू की गई ‘सेबाश्रय’ पहल कभी जनसंपर्क और जनकल्याण के मॉडल के तौर पर पेश की गई थी। अब यही योजना स्वास्थ्य शिविरों में कथित अनियमितताओं, इलाज में लापरवाही और मेडिकल उपकरणों के कथित अनधिकृत इस्तेमाल को लेकर पुलिस शिकायतों और एफआईआर के घेरे में है। पढ़ें पूरी खबर।