कलकत्ता हाई कोर्ट ने शुक्रवार को पुलिस द्वारा आरोपियों को कमर में रस्सी बांधकर सार्वजनिक रूप से घुमाने की कथित प्रथा पर चिंता व्यक्त की और कहा कि राज्य को व्यक्तियों को गिरफ्तार करने और उन पर मुकदमा चलाने का अधिकार है, लेकिन वह उन्हें अपमानित नहीं कर सकता।
इस मामले में दायर कई जनहित याचिकाओं (PIL) पर सुनवाई करते हुए जस्टिस जॉयसेन गुप्ता और जस्टिस मीता दास की बेंच ने राज्य सरकार से अगले तीन सप्ताह के अंदर विस्तृत और लिखित रिपोर्ट मांगी है।
‘पुलिस किसी का सम्मान नहीं छीन सकती’
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कानूनी कार्रवाई और सार्वजनिक अपमान के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित किया। अदालत ने माना कि अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करना प्रशासन का अधिकार है, लेकिन इसके नाम पर किसी व्यक्ति की गरिमा और मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।
जस्टिस जॉय सेनगुप्ता ने पुलिस के इस रवैये की कड़ी आलोचना करते हुए कहा, “पुलिस आरोपियों को गिरफ्तार कर सकती है और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकती है। अगर वे दोषी पाए जाते हैं तो अदालत उन्हें फांसी तक की सजा दे सकती है। लेकिन गिरफ्तारी के नाम पर पुलिस किसी व्यक्ति के आत्मसम्मान और मानवाधिकारों को जानबूझकर नष्ट नहीं कर सकती।”
अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह अगले 21 दिनों के भीतर एक एफिडेविट दाखिल करे। इसमें स्पष्ट रूप से बताया जाए कि किन परिस्थितियों में या किसके आदेश पर पुलिस ने कानून को अपने हाथ में लेते हुए आरोपियों की कमर में रस्सी बांधकर उन्हें सार्वजनिक रूप से घुमाया।
भाजपा सरकार बनने के बाद बदला पुलिस के काम करने का तरीका
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा सरकार के गठन और तृणमूल शासन के अंत के बाद राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति सुधारने की प्रक्रिया शुरू हुई है। सरकार का दावा है कि रंगदारी, भ्रष्टाचार और सिंडिकेट राज से जुड़े असामाजिक तत्वों के खिलाफ राज्य पुलिस ने ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई है।
हालांकि, हाईकोर्ट में दायर याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि अपराध के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर कुछ मामलों में पुलिस ने कानूनी प्रक्रिया की सीमाओं को पार किया है। इसी संदर्भ में अदालत ने आरोपियों को रस्सी बांधकर सार्वजनिक रूप से घुमाने की घटनाओं पर राज्य सरकार से जवाब मांगा है और स्पष्ट किया है कि कानून का पालन करते हुए ही अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।
सरकार के समर्थकों का दावा है कि स्थानीय स्तर पर सक्रिय कथित दबंगों और असामाजिक तत्वों के प्रति आम लोगों के मन में बैठे डर को खत्म करने के लिए ऐसे कड़े कदम उठाना जरूरी था। हालांकि, पिछले कुछ दिनों में राज्य के विभिन्न जिलों से सामने आई तस्वीरों ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को चिंतित कर दिया है।
कई लोगों का मानना है कि आरोपियों की कमर में रस्सी बांधकर उन्हें सड़कों पर घुमाना कानून के शासन (Rule of Law) के कमजोर पड़ने और सत्ता के दुरुपयोग का संकेत है। यही वजह है कि यह विवाद अब अदालत की चौखट तक पहुंच चुका है।
हाईकोर्ट की सख्ती से सरकार की रणनीति पर सवाल
हाईकोर्ट के इस कड़े रुख के बाद नई सरकार की प्रशासनिक रणनीति को पहली बड़ी कानूनी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य सरकार अगले तीन सप्ताह में अदालत के समक्ष क्या रिपोर्ट पेश करती है।
शुभेंदु अधिकारी सरकार की इस कथित ‘दमनकारी नीति’ का भविष्य अब इस बात पर निर्भर करेगा कि राज्य सरकार अगले तीन सप्ताह के भीतर अदालत में क्या रिपोर्ट पेश करती है। अपराध नियंत्रण के नाम पर कहीं भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन तो नहीं हो रहा, यह सवाल फिलहाल जांच और न्यायिक समीक्षा के दायरे में है। आने वाले दिनों में अदालत की सुनवाई इस पूरे मामले की दिशा तय कर सकती है।
