Justice Shekhar Kumar Yadav News: इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस शेखर कुमार यादव बुधवार को रिटायर हो गए। अपने सम्मान में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जस्टिस यादव ने स्पष्ट किया कि प्रयागराज में विश्व हिंदू परिषद की कानूनी प्रकोष्ठ द्वारा आयोजित कार्यक्रम में दिए गए उनके भाषण के शब्दों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया था।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस यादव ने अपने रिटायरमेंट भाषण में कहा, “मेरा कोई दोष नहीं था। तोड़ मरोड़ के पेश करने वालों का था।” उन्होंने उस दौरान उनका साथ देने के लिए बार के सदस्यों को धन्यवाद देते हुए कहा, “एक और दौर आया, जिसमें मेरी कोई गलती नहीं थी और उस दौरान मुझे आपका समर्थन मिला। अगर मुझे वह समर्थन नहीं मिलता, तो मैं टूट जाता।”
क्या था पूरा विवाद?
बता दें कि साल 2024 में 8 दिसंबर को वीएचपी के एक कार्यक्रम में बोलते हुए जस्टिस यादव ने कहा था, “मुझे यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि यह हिंदुस्तान है और देश हिंदुस्तान में रहने वाले बहुसंख्यकों के हिसाब से चलेगा। समान नागरिक संहिता का समर्थन करते हुए उन्होंने मुस्लिम समुदाय का हवाला देते हुए कहा कि आपको गलतफहमी है कि अगर कोई कानून (यूसीसी) लाया जाता है, तो यह आपकी शरीयत, आपके इस्लाम और आपके कुरान के खिलाफ होगा, लेकिन मैं एक और बात कहना चाहता हूं। चाहे वह आपका पर्सनल लॉ हो, हमारा हिंदू कानून हो, आपका कुरान हो या फिर हमारी गीता हो, जैसा कि मैंने कहा कि हमने अपनी प्रथाओं में मौजूद बुराइयों (बुराइयों) को संबोधित किया है।”
मैंने न्याय देते समय भेदभाव नहीं किया- जस्टिस यादव
आज अपने विदाई भाषण में जस्टिस यादव ने पीठ में अपनी निष्पक्षता का जोरदार बचाव किया। कार्यक्रम में उपस्थित वकीलों को देखते हुए उन्होंने कहा, “आप यहां हर जाति के वकील हैं, कोई यह नहीं कह सकता कि मैंने न्याय देते समय भेदभाव किया। मैंने कभी छोटे या बड़े वकीलों या किसी भी जाति के वकीलों के बीच कोई अंतर नहीं किया।”
उन्होंने इस बात पर और जोर दिया कि किसी मामले की पैरवी करते समय वकील का व्यवहार बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने सलाह दी, “न्यायाधीश के पास आपकी जमानत मंजूर करने या खारिज करने का अधिकार है। आपके व्यवहार में विनम्रता और सम्मान झलकना चाहिए।”
कुछ लोग इस पेशे को बदनाम करने की कोशिश कर रहे – जस्टिस यादव
जस्टिस यादव ने आगे कहा, “इसलिए भले ही मामला कमजोर हो, न्यायाधीश उसे प्राथमिकता देते हैं। अगर सब कुछ ठीक है, लेकिन दलीलें अच्छी नहीं हैं, बाहरी रूप-रंग अच्छा नहीं है, तो मामला कमजोर पड़ जाता है।” जस्टिस यादव इस बात पर चिंता व्यक्त की कि वरिष्ठ वकीलों के अदालत में प्रवेश करते ही कनिष्ठ वकील खड़े नहीं होते। उन्होंने यह भी कहा कि हालांकि लोग स्वाभाविक रूप से वकीलों का सम्मान करते हैं, “कुछ लोग इस पेशे को बदनाम कर रहे हैं।”
अपने भाषण में जस्टिस यादव ने अपनी साधारण शुरुआत को भी याद किया। उन्होंने बताया कि वे गर्व से साइकिल से अपने ननिहाल जाया करते थे, यह सोचकर कि वे अब हाईकोर्ट में वकील हैं और उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वे न्यायाधीश बनेंगे। उन्होंने कहा कि सफलता के लिए दृढ़ संकल्प और बड़ों के प्रति सम्मान ही एकमात्र सच्ची पूर्व शर्तें हैं और यदि किसी वकील में ईमानदारी और सम्मान है, तो ” कोई भी आपको सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचने से नहीं रोक सकता।”
अपने संबोधन के समापन में जस्टिस यादव ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकीलों और जजों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “मुझे आप सभी से जो प्यार मिला है, वैसा प्यार मुझे कहीं और नहीं मिला। मैंने सिर्फ प्यार दिया है और प्यार पाया है। आपको वही मिलता है जो आप देते हैं।”
महाभियोग की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई
13 दिसंबर 2024 को राज्यसभा में विपक्ष के 54 सांसदों ने जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ महाभियोग का नोटिस प्रस्तुत किया था जिसमें उन पर घृणास्पद भाषण देने और सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने का आरोप लगाया गया था। इस पर जस्टिस शेखर यादव को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का समर्थन प्राप्त हुआ। अंततः महाभियोग की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई क्योंकि राज्यसभा सचिवालय ने प्रस्तुत प्रस्ताव में शामिल 54 हस्ताक्षरों में से कुछ में विसंगति का हवाला देते हुए सत्यापन प्रक्रिया शुरू कर दी। साल 2025 के मध्य तक, 44 सांसदों ने अपने हस्ताक्षर प्रमाणित किए जो प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक 50 हस्ताक्षरों से कम थे। पढ़ें पूरी खबर…
