इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने हाल ही में अपने एक ज्यूडिशियल ऑर्डर के दौरान गंभीर बात कही। उन्होंने कहा कि एक न्यायाधीश के लिए एक ही दिन में मामलों की एक लंबी सूची से निपटना कितना थका देने वाला हो सकता है।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, ऋण वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी) के एक आदेश के विरुद्ध 24 फरवरी को दायर याचिका पर सुनवाई के बाद न्यायाधीश ने तत्काल आदेश पारित करने के बजाय, निम्नलिखित टिप्पणी के साथ फैसला सुरक्षित रख लिया।
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने कहा, ‘चूंकि मुझे भूख लग रही है, थकान महसूस हो रही है और मैं शारीरिक रूप से निर्णय देने में असमर्थ हूं, इसलिए फैसले को सुरक्षित रखा जाता है।”
कोर्ट ने दर्ज किया कि मामले की सुनवाई शाम 4:15 बजे शुरू हुई और शाम 7:10 बजे समाप्त हुई। न्यायालय ने कार्य समय के बाद सुनवाई का कारण भी बताया।
अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट से याचिका पर यथाशीघ्र यानी अधिकतम छह महीने के भीतर निर्णय लेने का आग्रह किया था। छह महीने की अवधि 24 फरवरी को समाप्त हो गई।
जज ने लिखा, “आज 92 नए मामले, 101 नियमित मामले, 39 नए विविध आवेदन और अतिरिक्त/असूचीबद्ध सूची-I, II और III में सूचीबद्ध तीन मामले थे। आज केवल क्रमांक 29 तक के नए मामलों की ही सुनवाई हो सकी। हालांकि, माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश को ध्यान में रखते हुए, इस मामले की सुनवाई शाम 4.15 बजे शुरू हुई और शाम 7.10 बजे समाप्त हुई।”
गौरतलब है कि मई 2025 में जस्टिस पंकज भाटिया की अध्यक्षता वाली एक समन्वय पीठ ने याचिकाकर्ता की सुनवाई किए बिना आदेश पारित किए जाने की बात पर ध्यान देते हुए डीआरटी द्वारा पारित आदेश को रद्द कर दिया था। न्यायाधीश ने मामले की खूबियों पर चर्चा किए बिना कहा था कि याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर प्रदान करने के बाद कानून के अनुसार नया आदेश पारित करने के लिए मामले को डीआरटी को वापस भेजा जाता है।
हालांकि, अगस्त 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने मामले को नए सिरे से निर्णय के लिए उच्च न्यायालय को वापस भेज दिया। शीर्ष न्यायालय ने इस मामले में प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन पाया था, क्योंकि उधारकर्ता को कोई नोटिस जारी नहीं किया गया था।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन होने के कारण, दिनांक 26 मई, 2025 का आदेश मान्य नहीं हो सकता। इसे रद्द किया जाता है। इससे संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत उच्च न्यायालय में याचिका पुनः प्रस्तुत की जा सकेगी। उच्च न्यायालय से अनुरोध है कि वह उक्त याचिका पर यथाशीघ्र, और यदि संभव हो तो छह महीने के भीतर अपने विवेकानुसार निर्णय ले। इसके बाद यह मामला जस्टिस विद्यार्थी के समक्ष नए सिरे से विचार के लिए आया।
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