इलाहाबाद हाई कोर्ट की एक खंडपीठ के दो जजों ने एक खास मामले में मानवाधिकार आयोगों के काम करने के तरीके पर अलग-अलग राय जताई है। इसके बाद दोनों जजों ने अलग-अलग अंतरिम आदेश पारित किए।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिल अतुल श्रीधरन ने यह टिप्पणी की कि देश भर के मानवाधिकार आयोग (NHRC) देश में मुसलमानों पर हुए हमलों और लिंचिंग से जुड़े मामलों में स्वतः संज्ञान लेने में विफल रहे हैं। वहीं, जस्टिस विवेक सरन ने कहा कि वह इस तरह की व्यापक टिप्पणियों से सहमत नहीं हैं।
कोर्ट मदरसों के कामकाज के संबंध में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा पारित कुछ आदेशों के खिलाफ टीचर्स एसोसिएशन मदरिस अरबिया (Teachers Association Madaris Arabia) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था।
जस्टिस श्रीधरन ने मदरसों के खिलाफ जांच का निर्देश जारी करने की राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की शक्ति पर सवाल उठाए। श्रीधरन ने कहा कि मानवाधिकार आयोग अपने अधिकार क्षेत्र से परे मामलों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, विशेष रूप से उन मामलों पर जिन्हें अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट के समक्ष उठाया जा सकता है।
जस्टिस अतुल श्रीधरन ने कहा, “मुस्लिम समुदाय के सदस्यों पर हमले और कुछ मामलों में उनकी पीट-पीटकर हत्या किए जाने की घटनाओं में स्वतः संज्ञान लेने के बजाय, जहां अपराधियों के खिलाफ मामले दर्ज नहीं किए जाते या ठीक से जांच नहीं की जाती, मानवाधिकार आयोग उन मामलों में हस्तक्षेप करते नजर आते हैं, जिनका प्रथम दृष्टया उनसे कोई लेना-देना नहीं है।”
श्रीधरन ने आगे कहा कि कोर्ट को इस बात की जानकारी नहीं है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग उन मामलों में स्वतः संज्ञान लेता है जहां कुछ समूह कानून को अपने हाथ में ले लेते हैं और देश के आम नागरिकों को परेशान करते हैं। न्यायाधीश ने विशेष रूप से विभिन्न समुदायों के कारण रिश्तों की प्रकृति को लेकर लोगों के उत्पीड़न पर प्रकाश डाला। उन्होंने आगे कहा कि सार्वजनिक स्थान पर अलग धर्म के व्यक्ति के साथ एक कप कॉफी पीना भी कभी-कभी भय का कारण बन जाता है।
जस्टिस श्रीधरन ने कहा कि ऐसे मामलों में इस न्यायालय के समक्ष ऐसा कोई उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया गया है कि क्या राज्य मानवाधिकार आयोग या राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने स्वतः संज्ञान लिया था। इसके बजाय, न्यायालय के पास उन मामलों पर विचार करने का समय है जो अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और जिनमें प्रभावी रूप से न्याय प्रदान किया जा सकता है।
वहीं, जस्टिस सरन ने कहा कि वे जस्टिस श्रीधरन द्वारा की गई टिप्पणियों से सहमत नहीं हैं। उन्होंने एक अलग आदेश पारित किया। सरन ने कहा कि चूंकि अनुच्छेद 6 और 7 में विभिन्न तथ्यों का उल्लेख किया गया है, जिनसे मैं सहमत नहीं हूं, इसलिए मैं जस्टिस अतुल श्रीधरन द्वारा दिए गए आदेश से असहमत हूं।
न्यायमूर्ति सरन ने यह भी कहा कि यदि मामले की खूबियों या यहां तक कि एनएचआरसी की भूमिका से संबंधित कोई आदेश पारित किया जाना था, तो सभी संबंधित पक्षों को सुना जाना चाहिए था। न्यायाधीश ने कहा कि मैं इस तथ्य से भी अवगत हूं कि रिट न्यायालय किसी विशेष पक्ष की अनुपस्थिति में भी आदेश पारित कर सकता है। हालांकि, इस मामले में जब अनुच्छेद संख्या 6 और 7 में कुछ निश्चित टिप्पणियां की जा रही थीं, तो यह उचित होता कि पक्षकार न्यायालय में विधिवत उपस्थित होते। पक्षकारों की अनुपस्थिति में किसी भी प्रतिकूल टिप्पणी की आवश्यकता नहीं थी।
पंजाब के मानसा की एक कोर्ट ने मंगलवार को मुख्यमंत्री भगवंत मान के खिलाफ चल रहे मानहानि के मामले में बार-बार पेश न होने पर फटकार लगाई है। मानसा स्थित अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) राजिंदर सिंह नागपाल ने बताया कि सीएम भगवंत मान अक्टूबर 2022 से अब तक एक बार भी अदालत में पेश नहीं हुए हैं, जिसके कारण मामले की आगे की कार्यवाही रुकी हुई है। उस समय उनकी पेशी के दौरान ही आवश्यक जमानत बांड जमा करने पर उन्हें जमानत दी गई थी। पढ़ें पूरी खबर।
