सुप्रीम कोर्ट में सातवें दिन बुधवार को सबरीमाला मामले की सुनवाई हुई। इस दौरान बार एसोसिएशन और न्यायाधीशों के बीच कुछ महत्वपूर्ण बहसें हुईं। जिसमें कार्यवाही सांप्रदायिक अधिकारों, न्यायिक समीक्षा और सामाजिक सुधार के मामलों में हस्तक्षेप करने की राज्य की शक्ति के बीच संबंधों पर केंद्रित थी।

सीजेआई सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कहा कि जहां तक ​​सामाजिक कल्याण या सुधारों का सवाल है, यह एक बहुत व्यापक शब्द है और राज्य कोई अजनबी या पराया नहीं है। राज्य जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है और यदि जनता कुछ सामाजिक बुराइयों में सुधार चाहती है, तो संभवतः उस शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है। लेकिन हमारे लिए भविष्य के लिए कोई दिशा-निर्देश देना बहुत कठिन है। यह हमेशा मामले दर मामले पर निर्भर करेगा कि क्या सुधार अनुच्छेद 25(2)(B) के दायरे में आते हैं या क्या यह सुधार के नाम पर शक्ति का दुरुपयोग है, जिसमें कुछ ऐसा शामिल किया जाता है जो किसी धार्मिक प्रथा का उल्लंघन करता है।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि सभी मनुष्य अंतरात्मा से बंधे होते हैं। चाहे अंतरात्मा का स्वरूप और गुणवत्ता कैसी भी हो। उन्होंने आगे कहा कि यही बात होमो सेपियंस को जानवरों से अलग बनाती है।

जस्टिस अरविंद कुमार ने कहा, “तो क्या अदालतें बैठकर यह तय करेंगी कि किसी धार्मिक प्रथा का धर्मशास्त्रीय मतलब क्या है?” न्यायाधीश ने यह बात तब कही जब वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम, जो एक पुनर्विचार याचिकाकर्ता की ओर से पेश हो रहे थे। सुब्रमण्यम ने एक प्रथा की प्रकृति को लेकर “अंतर-धार्मिक” विवाद पर बहस की थी।

सुब्रमण्यम ने कहा, “ऐसे कई मामले रहे हैं- जैसे प्रसिद्ध ‘वडकलई-तेंकलई’ विवाद, जो सदियों से चला आ रहा है और मुझे आज भी नहीं पता कि वह खत्म हुआ या नहीं। मैं यह उदाहरण इसलिए दे रहा हूं कि ऐसे मामलों में काम करना पड़ता है। इन स्थितियों में आपको साक्ष्य चाहिए, सबूत चाहिए, और तथ्यों का पता लगाना पड़ता है।” उन्होंने आगे कहा, “लेकिन आपके प्रश्न का मूल मुद्दा यह है- क्या अदालत के पास निर्णय करने की शक्ति नहीं है? इसका जवाब है कि अदालत के पास यह शक्ति है।” सुब्रमण्यम ने यह भी जोड़ा कि “कानूनी अधिकार या कानूनी नुकसान को स्थापित करने के लिए अदालत के अलावा कोई और जगह नहीं है। हालांकि, मैं मानता हूं कि ये परिस्थितियां आदर्श नहीं हैं।”

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, “राज्य कोई अजनबी या पराया नहीं है, बल्कि यह जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें सामाजिक बुराइयों को सुधारने की शक्ति होती है।”

जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “हिंदू समाज को एकजुट होना चाहिए और यह नहीं कहना चाहिए कि हम एक संप्रदाय के हैं, वे दूसरे संप्रदाय के हैं। वे हमारे मंदिर में नहीं आ सकते, हम उनके मंदिर में नहीं जा सकते, यह विचार स्वीकार्य नहीं है। यदि वे मंदिर को दूसरों के लिए नहीं खोलते हैं तो उस संप्रदाय को नुकसान होगा।”

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने उदाहरण देते हुए कहा, “एक धार्मिक संप्रदाय का मानना ​​है कि विधवा होने वाली महिला को सती होना पड़ता है, इसलिए अनुच्छेद 25 (2) (B) के संदर्भ में सती प्रथा को समाप्त किया जाना चाहिए। इसे किसी धार्मिक प्रथा का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।” न्यायाधीश ने यह बात सुब्रमण्यम के इस कथन के बाद कही कि व्यक्तिगत कानून के दायरे में भी भेदभाव हो सकता है। उन्होंने आगे कहा कि उस भेदभाव को दूर करना भी एक सामाजिक कल्याण सुधार हो सकता है, जो सीधे अनुच्छेद 25 (2) (B) के अंतर्गत आता है। उन्होंने कहा कि भेदभाव को दूर करने के लिए अनुच्छेद 14 का सहारा लेना जरूरी नहीं है।

क्या है मामला?

सुप्रीम कोर्ट सबरीमाला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और संविधान के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई कर रहा है।

सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता में नौ न्यायाधीशों की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। जिसमें जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्य बागची भी शामिल हैं।

28 सितंबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से महिला आगंतुकों पर आयु प्रतिबंध हटा दिया और केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल नियम, 1965 के नियम 3 (B) को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था, जो रीति-रिवाज के आधार पर महिलाओं को बाहर करने की अनुमति देता था।

हिंदू मंदिरों पर नियंत्रण नहीं रखना चाहती सरकार, केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में साफ किया अपना रुख

केंद्र सरकार ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में साफ कहा कि वह मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण के पक्ष में नहीं है। केंद्र ने यह भी कहा कि उसने केवल संविधान के प्रावधानों की व्याख्या की है, न कि मंदिरों पर नियंत्रण की कोई मांग की है। पढ़ें पूरी खबर।