पुणे की एक विशेष अदालत ने 25 जून को तीन साल की बच्ची से दुष्कर्म और उसकी हत्या के मामले में 65 वर्षीय भीमराव कांबले को दोषी करार दिया। आज सोमवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने उसे फांसी की सजा सुना दी। बड़ी बात यह है कि इस मामले की सुनवाई महज दो महीने में पूरी कर ली गई।
जानकारी के लिए बता दें कि अदालत ने भीमराव कांबले को भारतीय न्याय संहिता (BNS) और पॉक्सो (POCSO) कानून के तहत लगाए गए सभी आरोपों में दोषी माना है। राज्य सरकार की ओर से विशेष लोक अभियोजक अजय मिसर और पीड़िता के पिता ने आरोपी को फांसी की सजा देने की मांग की थी। अब अदालत ने सभी सबूतों को आधार मानते हुए भीमराव को दोषी माना है और यह कड़ी सजा सुनाई है।
अदालत ने इस मामले को ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’ माना है। जैसे ही जज ने मौत की सजा का ऐलान किया, पीड़ित बच्ची के परिजन कोर्ट रूम में ही फूट-फूट कर रोने लगे। फैसले का मुख्य हिस्सा पढ़ते हुए जज एस. आर. सालुंखे ने बताया कि मौजूद सबूत बताते हैं कि आरोपी का अपराध बेहद गंभीर है। अभियोजन पक्ष ने जो आरोप लगाए थे, वे पूरी तरह साबित हो चुके हैं। अदालत ने यह भी कहा, “आरोपी पहले भी गंभीर अपराधों में शामिल रह चुका है। इस मामले में उसने एक मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या जैसे जघन्य अपराध को अंजाम दिया।”
जज एस. आर. सालुंखे के मुताबिक आरोपी ने वारदात को बेहद क्रूर तरीके से अंजाम दिया। उसने पीड़िता के साथ अमानवीय व्यवहार किया और उसे यातनाएं देने का काम भी किया। पीड़िता एक मासूम और बेबस बच्ची थी। आरोपी ने अपनी हवस मिटाने के लिए उसकी हत्या कर दी जो उसकी विकृत मानसिकता को दर्शाता है। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि इस मामले में ऐसा कोई आधार नहीं मिला जिसके चलते आरोपी की सजा कम की जा सके।
आरोपी की ज्यादा उम्र होने पर भी जज ने अहम टिप्पणी की। उनका कहना रहा कि आरोपी की उम्र 65 साल है। यही एक बात उसके पक्ष में कही जा सकती है, लेकिन मेरी नजर में यह सजा कम करने का कारण नहीं हो सकता है बल्कि अपराध को और गंभीर बनाने का कारण है।
अभियोजन पक्ष ने अदालत में कई अहम सबूत पेश किए जिनकी वजह से आरोपी के खिलाफ मामला मजबूत हुआ। इनमें CCTV फुटेज, DNA रिपोर्ट, फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) की रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य साक्ष्य शामिल रहे। पुलिस ने इस मामले में अपराध के 14 दिनों के भीतर करीब 1,100 पन्नों की चार्जशीट अदालत में दाखिल कर दी थी। वहीं, मामले की जल्द सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस केस की रोजाना सुनवाई के निर्देश दिए थे।
उस रोजाना सुनवाई की वजह से ही इस मामले में दो महीने के भीतर ही आरोप भी सिद्ध हो गए और अब सजा भी दी जाएगी। जानकार मानते हैं कि इस प्रकार की तेज सुनवाई और कार्रवाई कम ही देखने को मिलती है।
ये भी पढ़ें- भारत के लिए बेहद अहम है छोटा सा देश सेशेल्स?
