हाई कोर्ट ने सीआरपीएफ में एचआईवी पॉजिटिव महिलाओं को प्रमोशन से वंचित करने वाले नियमों पर सवाल उठाए हैं। गुजरात उच्च न्यायालय ने एचआईवी संक्रमित कर्मियों के साथ भेदभाव करने वाले नियमों के लिए केंद्र सरकार को फटकार लगाई है।
उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के वरिष्ठ अधिकारियों को चेतावनी दी है कि अगर एचआईवी पॉजिटिव कर्मियों के साथ भेदभाव करने वाले सेवा नियमों में संशोधन के लिए दिए गए निर्देशों का समय सीमा के भीतर पालन नहीं किया गया तो उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही की जाएगी। अदालत की ये कड़ी टिप्पणियां एक महिला सीआरपीएफ अधिकारी के मामले में आईं, जिसे एचआईवी पॉजिटिव होने के कारण पदोन्नति से वंचित कर दिया गया था।
HIV संक्रमित लोगों के खिलाफ भेदभाव
मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डीएन रे की खंडपीठ ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के हलफनामे को खारिज कर दिया। न्यायालय ने पाया कि अर्धसैनिक बल ने एचआईवी और एड्स (रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम, 2017 के प्रावधानों में संशोधन नहीं किया है जिसका उद्देश्य एचआईवी संक्रमित लोगों के खिलाफ भेदभाव का मुकाबला करना है।
अदालत ने सोमवार को टिप्पणी की, “यह सिर्फ बलों के बारे में नहीं है, यह उन लोगों के बारे में है जो आपके संस्थान में मौजूद हैं। इस कलंक को दूर करना होगा। अगर कोई सेवा के दौरान एचआईवी वायरस से संक्रमित हो जाता है तो यह अधिनियम आपको भेदभाव करने की अनुमति नहीं देता।” नियमों में संशोधन का यह सवाल तब उठा जब एक रिटायर्ड याचिकाकर्ता ने दिसंबर में उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। याचिकाकर्ता ने अपने प्रमोशन के संबंध में न्यायालय के अगस्त 2025 के आदेश पर स्पष्टीकरण मांगा।
महिला अधिकारी जो एक सब इंस्पेक्टर (मिनिस्टेरियल) थीं, उन्होंने 2025 में अदालत का रुख किया जब उन्हें इंस्पेक्टर (मिनिस्टेरियल) और बाद में सहायक कमांडेंट (मिनिस्टेरियल) के पद पर समय पर प्रमोशन से वंचित कर दिया गया। उन्हें एचआईवी पॉजिटिव होने के कारण लोअर मेडिकल केटेगरी में रखा गया था। 4 अगस्त, 2025 को अपने फैसले में उच्च न्यायालय ने न केवल उन्हें प्रमोशन और वित्तीय लाभ देने का आदेश दिया बल्कि अधिकारियों को सीआरपीएफ के चिकित्सा और भर्ती नियमों में संशोधन करने का भी निर्देश दिया ताकि एचआईवी पॉजिटिव कर्मियों के साथ भेदभाव करने वाले प्रावधानों को हटाया जा सके।
गुजरात हाई कोर्ट ने HIV संक्रमितों को लेकर सुनाया फैसला
गुजरात हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि आदेश के अन्य खंडों में भी संशोधन किया जाना आवश्यक है ताकि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, किसी भी प्रकार के भेदभाव को दूर किया जा सके जो एचआईवी/एड्स पॉजिटिव व्यक्ति (व्यक्तियों) को किसी भी लाभ, अवसर या फायदे से वंचित करता है या रोकता है। न्यायालय ने माना कि ये नियम कानून से परे, भेदभावपूर्ण और मनमाने थे। याचिकाकर्ता के साथ अन्याय हुआ है इस बात को बताते हुए न्यायालय ने कहा कि सीआरपीएफ के सेवा नियमों को एचआईवी/एड्स (रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम, 2017 के अनुरूप लाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया है।
अदालत ने सीआरपीएफ और गृह मंत्रालय से स्पष्टीकरण मांगा
अदालत ने सीआरपीएफ और गृह मंत्रालय से बार-बार यह स्पष्टीकरण मांगा है कि संशोधनों को अभी तक लागू क्यों नहीं किया गया है। दिसंबर में, अदालत ने अधिकारियों के बाद के आदेशों और सीआरपीएफ द्वारा जारी किए गए संकेत को अपने निर्देशों का उल्लंघन मानते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया। अदालत ने कहा कि प्रतिवादियों को यह स्पष्ट करना होगा कि उनके खिलाफ जानबूझकर और स्वेच्छा से निर्देशों का पालन न करने की कार्यवाही क्यों शुरू नहीं की जानी चाहिए।
बाद में अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता की पदोन्नति भी निर्देशानुसार लागू नहीं की गई थी। सीआरपीएफ ने उनके प्रमोशन की प्रभावी तिथि अगस्त 2019 से आगे बढ़ा दी थी जबकि उनके जूनियरों का प्रमोशन अगस्त 2019 में हुआ था। पीठ ने इस व्याख्या को खारिज कर दिया और अपने मूल आदेश में कोई भ्रम नहीं पाया जिसके चलते कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।
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