गुजरात हाई कोर्ट ने पिछले सप्ताह एक साइबर कानून विशेषज्ञ को जमानत दे दी। आरोपी पर फर्जी कॉल सेंटर चलाकर शेयर बाजार के निवेशकों से धोखाधड़ी करने का आरोप है। अदालत ने यह कहते हुए जमानत दी कि राज्य अभियोजन ने अलग-अलग अदालतों में मामले को लेकर “चयनात्मक दृष्टिकोण (Selective Approaches)” अपनाया और उसके रुख में विरोधाभास नजर आया।

जून, 2025 से मीत रावल न्यायिक हिरासत में है। उस पर मेहसाना जिले के वड़नगर पुलिस स्टेशन में दर्ज एक मामले में धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश के आरोप हैं।

अभियोजन पक्ष का आरोप है कि रावल ने अपने कानूनी ज्ञान का इस्तेमाल अपने भाई को एक फर्जी कॉल सेंटर चलाने में मदद करने के लिए किया। आरोप है कि इस गिरोह ने ‘मार्केट प्लस’ नामक एक एप्लिकेशन के माध्यम से पीड़ितों को लुभाया, जिसमें स्वचालित डायलिंग सिस्टम का उपयोग करके शेयर बाजार के टिप्स, कमीशन और उच्च रिटर्न का वादा किया गया था। जांचकर्ताओं के अनुसार, हब ब्रोकरेज नामक एक फर्म से संबंधित खातों के माध्यम से 5.49 करोड़ रुपये से अधिक की रकम ट्रांसफर की गई थी।

जस्टिस हसमुख डी सुथार के आदेश में दर्ज है कि रावल के छह पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड हैं, लेकिन फिर भी उसे ” निर्दोष माने जाने का अधिकार ” है, जांच पूरी हो चुकी है और आरोपपत्र दाखिल कर दिया गया है। उससे आगे कुछ भी बरामद करने की आवश्यकता नहीं है, और ये अपराध मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय हैं, जिसका अर्थ है कि मुकदमे को पूरा होने में समय लगेगा।

बचाव पक्ष के तर्क

रावल के वकील ए.एस. टिंबालिया ने दलील दी कि उनके मुवक्किल को झूठा फंसाया गया है और जांच पूरी हो चुकी है। अब कुछ भी बरामद या पता लगाने के लिए नहीं बचा है। उन्होंने बताया कि रावल के खिलाफ इसी तरह के आरोपों पर तीन अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई हैं और उन्हें अन्य मामलों में जमानत पर रिहा किया जा चुका है।

मौजूदा मामले में बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि सह-आरोपी अनिल ठाकोर और दशरथ ठाकोर को क्रमशः 1.68 करोड़ रुपये और 1.46 करोड़ रुपये मिले थे और वे पहले से ही सत्र न्यायाधीश द्वारा दी गई जमानत पर बाहर थे, और सह-आरोपी लवेश, जिसे 7 लाख रुपये मिले थे, उसे भी जमानत मिल गई थी।

बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि अभियोजन पक्ष ने पहले सत्र न्यायालय को गलत तरीके से बताया था कि रावल के खाते में 1 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए थे। बचाव पक्ष ने कहा कि वास्तविक राशि 7 लाख रुपये थी, जो उनके एक्सिस बैंक और बंधन बैंक खातों में भेजी गई थी। बचाव पक्ष ने आगे कहा कि इस राशि से सोने की कथित खरीद एक अलग एफआईआर का विषय है।

अतिरिक्त लोक अभियोजक ने जमानत का विरोध करते हुए तर्क दिया कि रावल ने साइबर कानून विशेषज्ञ के रूप में अपनी विशेषज्ञता का इस्तेमाल अपने भाई को कॉल सेंटर चलाने, पीड़ितों को लुभाने, धोखाधड़ी से प्राप्त धन को कई खातों के माध्यम से स्थानांतरित करने और यूपीआई और बैंक हस्तांतरण के माध्यम से उस धन को सोने में परिवर्तित करने में मदद करने के लिए किया।

अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि उसके खाते से 1 करोड़ रुपये से अधिक का लेन-देन हुआ था और उसकी भूमिका पहले से रिहा किए गए सह-आरोपियों की तुलना में कहीं अधिक गंभीर थी। अभियोजन पक्ष ने चेतावनी दी कि यदि उसे रिहा किया गया तो वह दोबारा अपराध कर सकता है या सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकता है।

हाई कोर्ट ने गौर किया कि आवेदक की कथित संलिप्तता के संबंध में अलग-अलग आंकड़े अलग-अलग समय पर अलग-अलग अदालतों के समक्ष प्रस्तुत किए गए थे और “राज्य ने परिणामस्वरूप जारी जमानत आदेशों को किसी भी अपीलीय मंच के समक्ष चुनौती नहीं दी थी”।

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