सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि सरकारी कर्मचारियों को पुराने सेवा नियमों के तहत पदोन्नति पाने का कोई निहित अधिकार नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि सरकार किसी भी चरण में नए सेवा नियम लाकर चयन और पदोन्नति के तरीके और प्रक्रिया में बदलाव करने में सक्षम हैं, लेकिन वह मनमाने न हों।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने राज्य परिवहन विभाग में पदोन्नति को लेकर चल रहे विवाद में ओडिशा सरकार द्वारा दायर अपीलों को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया।
विवाद किस बात को लेकर था?
इस मामले में ओडिशा के परिवहन विभाग में कार्यरत दो कर्मचारी शामिल थे। जिन्होंने सहायक क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी (एआरटीओ) के पद पर पदोन्नति की मांग की थी।
कर्मचारियों ने इस बात का तर्क दिया कि 1981 के पुराने कार्यकारी निर्देश जब लागू थे, उस वक्त भी एआरटीओ में खाली पदों में बढ़ोतरी हुई थी। 1981 के निर्देशों के मुताबिक, जो वरिष्ठ कर्मचारी थे उन्हें मेरिट के आधार पर प्रमोट किया जा सकता था।
हालांकि, पदोन्नति होने से पहले वर्ष 2017 में ओडिशा सरकार ने कैडर का पुनर्गठन कर दिया। इसके बाद संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत वर्ष 2021 में ओडिशा ट्रांसपोर्ट सर्विस नियम लागू किए गए। अनुच्छेद 309 राज्य सरकारों को सरकारी कर्मचारियों की भर्ती और सेवा शर्तों को विनियमित करने का अधिकार देता है।
भर्ती प्रक्रिया पदोन्नति आधारित चयन से बदलकर ओडिशा लोक सेवा आयोग (ओपीएससी) द्वारा आयोजित प्रतियोगी परीक्षा पर आधारित हो गई है। नियम में बदलाव के बावजूद, ओडिशा हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह कर्मचारियों को पदोन्नति के लिए पुराने कार्यकारी निर्देशों के तहत विचार करे। इसके बाद राज्य सरकार ने उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में क्या कहा गया?
हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि रिक्तियों को स्वतः उन निर्देशों या नियमों के तहत भरना आवश्यक नहीं है, जो पद खाली होने के समय लागू थे। न्यायालय ने कहा कि रिक्तियों को उन कार्यकारी निर्देशों के तहत भरना आवश्यक नहीं है, जो उनके उत्पन्न होने के समय लागू थे।
पीठ ने आगे कहा कि सरकारें भर्ती नीतियों को बदलने, कैडरों का पुनर्गठन करने और चयन के तरीकों को बदलने के लिए सक्षम हैं, बशर्ते कि ये परिवर्तन मनमाने न हों।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कर्मचारियों को मात्र पूर्व कार्यकारी निर्देशों के तहत पात्र होने मात्र से पदोन्नति का स्वतः या लागू करने योग्य अधिकार प्राप्त नहीं होता है। न्यायालय ने दोहराया कि सरकारी कर्मचारियों को पदोन्नति का कोई अंतर्निहित अधिकार नहीं है।
अदालत ने कहा कि इस मामले में सरकार ने सहायक क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी के पदों को न भरने का विकल्प चुना। यह कैडर के पुनर्गठन और 2021 के नियमों को लागू करने के मद्देनजर किया गया था, जो कानून के अनुरूप है। यह प्रस्ताव कि रिक्तियों को उस तिथि पर मौजूद नियमों के अनुसार पदोन्नति द्वारा भरा जाना चाहिए, उसे भी खारिज कर दिया गया है। इसलिए, सरकार द्वारा 2021 के नियमों के अनुसार इन रिक्तियों को भरने के निर्णय को गलत नहीं ठहराया जा सकता है।
कर्मचारियों के पास कौन-कौन से सीमित अधिकार हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी को प्राप्त एकमात्र सीमित अधिकार पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का अधिकार है, न कि स्वयं पदोन्नति की गारंटी। यह एक महत्वपूर्ण अंतर है क्योंकि पुराने निर्देशों के अंतर्गत पात्रता, उन निर्देशों के अंतर्गत पदोन्नति के लिए लागू किए जाने योग्य दावे में तब्दील नहीं होती।
अदालत ने आगे कहा कि यदि सरकार ने चयन की विधि में बदलाव करना उचित समझा, तो यह उसकी शक्ति, अधिकार और क्षमता के दायरे में था और जब तक बदली हुई नीति मनमानी साबित नहीं हो जाती, तब तक दश और साहू इस पद पर दावा नहीं कर सकते।
अदालत ने कहा कि यदि सरकार पुनर्गठन या नीतिगत परिवर्तनों के कारण पदोन्नति के माध्यम से रिक्त पदों को नहीं भरने का निर्णय लेती है, तो अदालतें पूर्व नियमों के तहत अधिकारियों को नियुक्तियां करने के लिए बाध्य नहीं कर सकती हैं।
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