सुप्रीम कोर्ट ने 1993 मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे गैंगस्टर अबू सलेम की समय से पहले रिहाई की मांग वाली याचिका गुरुवार को खारिज कर दी। सलेम ने अपनी याचिका में जेल में मिली रिमिशन और अंडरट्रायल के तौर पर बिताई गई अवधि को उसकी 25 साल की सजा की अधिकतम सीमा में शामिल करने की मांग की थी।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले में फैसला सुनाते हुए सलेम की याचिका खारिज कर दी। बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने सही माना है। आपको बता दें कि 27 जुलाई को सर्वोच्च अदालत ने अबू सलेम की याचिका पर फैसला सुरक्षित कर लिया था।

क्या थी अबू सलेम की दलील?
सलेम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने दलील दी थी कि ट्रायल के दौरान जेल में बिताई गई अवधि को उसका सजा में एडजस्ट किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि टाडा अदालत भी अंडरट्रायल के तौर पर बिताई गई अवधि को सजा में सेट ऑफ करनेका निर्देश दे चुकी है।

वकील ने यह भी तर्क दिया कि जेल में अच्छे आचरण के आधार पर अर्जित रिमिशन को वास्तविक कारावास की अवधि में गिना जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि सलेम भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 432 के तहत मिलने वाली वैधानिक रिमिशन का दावा नहीं कर रहा है बल्कि जेल में अच्छे आचरण के आधार पर अर्जित रिमिशन को सजा की अवधि में जोड़ने की मांग कर रहा है।

पुर्तगाल से प्रत्यर्पण की शर्त का दिया हवाला

अबू सलेम ने अपनी याचिका में भारत की ओर से पुर्तगाल को दिए गए प्रत्यर्पण आश्वासन का भी हवाला दिया था। सलेम का कहना था कि इस आश्वासन के तहत उसकी कैद की अवधि 25 साल की सीमा से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। उसका दावा था कि अंडरट्रायल अवधि और अर्जित रिमिशन को शामिल करने के बाद वह इस सीमा के करीब पहुंच चुका है।

इससे पहले मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया था कि वह याचिका खारिज कर सकता है। हालांकि पीठ ने उस समय आदेश सुरक्षित रख लिया था और दोनों पक्षों को लिखित दलीलें तथा संबंधित फैसले दाखिल करने की अनुमति दी थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने सलेम की समय से पहले रिहाई की मांग को खारिज कर दिया है।

इससे पहले क्या-क्या हुआ?

अप्रैल 2025 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने अबू सलेम की समय से पहले रिहाई की याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने कहा था कि भारत-पुर्तगाल प्रत्यर्पण समझौते के तहत तय 25 साल की अवधि नवंबर 2030 में पूरी होगी। इसलिए सलेम की रिहाई की मांग समय से पहले है।

भारत ने 17 दिसंबर 2002 को पुर्तगाल को आश्वासन दिया था कि भारत प्रत्यर्पित किए जाने के बाद सलेम को ना तो मौत की सजा दी जाएगी और ना ही 25 साल से ज्यादा जेल में रखा जाएगा। जुलाई 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी आधार पर कहा था कि 25 साल की कैद पूरी होने पर सलेम को रिहा करना होगा।

सलेम का दावा था कि उसने नवंबर 2005 से सितंबर 2017 तक करीब 11 साल 9 महीने 26 दिन अंडरट्रायल के रूप में और इसके बाद करीब 9 साल 10 महीने 4 दिन दोषी के तौर पर जेल में बिताए हैं। इसके अलावा उसे अच्छे आचरण के लिए रिमिशन और पुर्तगाल में अंडरट्रायल अवधि के लिए अतिरिक्त राहत भी मिली थी। उसका कहना था कि इन अवधियों को जोड़ने पर 25 साल की सीमा लगभग पूरी हो चुकी है और लगातार जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।

हालांक हाई कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि अर्जित रिमिशन को 25 साल की तय सीमा में से घटाया नहीं जा सकता। कोर्ट के मुताबिक, प्रत्यर्पण समझौते के कारण 25 साल की सीमा खुद उम्रकैद में दी गई एक बड़ी रियायत है। सामान्य जेल रिमिशन से इस अवधि को और कम करना सुप्रीम कोर्ट के आदेश और प्रत्यर्पण समझौते की भावना के खिलाफ होगा।

कोर्ट ने यह भी कहा कि सलेम की गिरफ्तारी 11 नवंबर 2005 को हुई थी। इस तारीख से 25 साल की गणना करने पर उसकी तय अवधि नवंबर 2030 में पूरी होगी।