कंटेंट क्रिएटर माधबी बिस्वास चक्रवर्ती को बुधवार को बड़ा झटका लगा है। त्रिपुरा हाई कोर्ट ने उनके खिलाफ आपराधिक मानहानि और आईटी अधिनियम के तहत लगाए गए आरोपों को रद्द करने से इनकार कर दिया। माधबी बिस्वास चक्रवर्ती पर आरोप है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अगरतला के मेयर दीपक मजूमदार और देवी माता त्रिपुरेश्वरी के बारे में अपमानजनक पोस्ट की थी।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस टी अमरनाथ गौड़ और जस्टिस एस दत्ता पुरकायस्था की खंडपीठ पूर्वी अगरतला और पश्चिमी अगरतला पुलिस स्टेशनों में बीएनएस की धारा 356 (मानहानि) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 (ऑनलाइन अश्लील सामग्री प्रकाशित करना) के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग वाली दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।

अदालत ने कहा कि एफआईआर और आरोपपत्र को रद्द करने के चरण में उसका कार्य केवल यह जांचने तक सीमित है कि क्या एफआईआर और आरोपपत्र प्रथम दृष्टया किसी अपराध के तत्वों को प्रकट करते हैं। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता के बयानों से प्रथम दृष्टया प्रधानमंत्री और महापौर के नामों का उपहास उड़ाकर उनकी आलोचना हुई थी और माता त्रिपुरेश्वरी से जुड़ी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची थी। यह मानहानि का मामला बनता है और शिकायतकर्ताओं को मुकदमा करने का अधिकार देता है।

पीठ ने यह भी कहा कि जांच अधूरी थी। हालांकि जांच अधिकारी ने याचिकाकर्ता का मोबाइल फोन जब्त कर लिया था, लेकिन उसमें मौजूद वीडियो क्लिप या स्क्रीन रिकॉर्डिंग को प्राप्त नहीं किया जा सका था और उन्हें निचली अदालत के समक्ष पेश करने के लिए और समय मांगा गया था।

चूंकि बीएनएसएस की धारा 193(9) चार्जशीट दाखिल होने के बाद भी आगे की जांच की अनुमति देती है, इसलिए न्यायालय ने माना कि पुलिस क्लाउड बैकअप या हटाए गए डेटा सहित गायब सामर्गी को बरामद करने और यदि आवश्यक हो तो न्यायालय से नए निर्देश की आवश्यकता के बिना एक पूरक चार्जशीट दाखिल करने के लिए स्वतंत्र है।

अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता याचिकाकर्ता के पोस्ट को संरक्षण प्रदान करती है। न्यायालय ने कहा कि मानहानि अनुच्छेद 19(2) के तहत एक उचित प्रतिबंध के रूप में कार्य करती है और अभिव्यक्ति की आजादी किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का लाइसेंस नहीं देती है।

इसमें अभिषेक सिंह बनाम अजय कुमार और सोमजीत मल्लिक बनाम झारखंड राज्य के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए यह माना गया कि एफआईआर में हर आरोप का विस्तृत विवरण होना आवश्यक नहीं है और अदालतों को अलग-अलग चूक के बजाय आरोपों के पूरे सार को देखना चाहिए।

याचिकाकर्ता को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था और बाद में त्रिपुरा हाई कोर्ट ने 7 जनवरी, 2026 के एक आदेश के माध्यम से उसे अंतरिम जमानत प्रदान की थी। ट्रायल कोर्ट द्वारा पुलिस की हिरासत में पूछताछ की याचिका खारिज करने के बाद, उसे 13 फरवरी को स्थायी जमानत दे दी गई। हालांकि, कार्यवाही केवल आरोपी की उपस्थिति और मामले से संबंधित दस्तावेजों की आपूर्ति के चरण में थी, इसलिए न्यायालय ने मामलों को रद्द करने के लिए बहुत प्रारंभिक मानते हुए दोनों याचिकाओं को खारिज कर दिया।

केजरीवाल-सिसोदिया पहुंचे दिल्ली हाई कोर्ट, शराब नीति मामले में CBI की याचिका पर उठाए सवाल

केजरीवाल और सिसोदिया ने अपनी याचिका में कहा गया कि सीबीआई ने अपनी रिवीजन याचिका के साथ ऐसा कोई नया सबूत, दस्तावेज या सामग्री पेश नहीं की है, जिससे यह साबित हो सके कि डिस्चार्ज का आदेश त्रुटिपूर्ण, मनमाना या कानून के खिलाफ था। पढ़ें पूरी खबर।