इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कुछ दिन पहले मेंटेनेस से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महिला को दिए जाने वाले मासिक भरण-पोषण (मेंटेनेंस) की रकम 1000 रुपये से बढ़ाकर 5000 रुपये करने के आदेश को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि बढ़ती महंगाई के दौर में किसी महिला के लिए मात्र 1000 रुपये प्रति माह में अपना गुजारा करना असंभव है।

जस्टिस अचल सचदेव ने एक याचिका खारिज को खारिज कर दिया जिसमें एक शख्स ने फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। फैमिली कोर्ट ने शख्स की पहली पत्नी को मिलने वाली मेंटेनेंस राशि बढ़ाई गई थी। इसके साथ ही अदालत ने उस व्यक्ति की उस अर्जी को भी खारिज कर दिया जिसमें उसने एकतरफा (एक्स-पार्टी) आदेश को वापस लेने की मांग की थी।

11 मई के अपने आदेश में उच्च न्यायालय ने कहा, ”निस्संदेह, पिछले 11 सालों में महंगाई काफी बढ़ चुकी है। यहां तक कि मजदूरों की मजदूरी में भी अच्छी खासी बढ़ोत्तरी हुई है। ऐसे महंगाई के समय में किसी महिला का केवल एक हजार रुपये में गुजारा करना संभव नहीं है।”

परिवार न्यायालय के आदेश की समीक्षा करते हुए जज अचल सचदेव ने कहा कि दोनों बच्चे बालिग (वयस्क) हो चुके हैं और अब वे भरण-पोषण (मेंटेनेंस) पाने के हकदार नहीं हैं।

मेंटेनेंस में इजाफे के खिलाफ याचिका

केस रिकॉर्ड्स के अनुसार, दोनों पक्षों का विवाह 1995 में हुआ था। पति ने तर्क दिया कि उसकी पत्नी पिछले 17 सालों से बिना किसी उचित कारण के उससे अलग रह रही है।

मामले के रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों पक्षों का विवाह वर्ष 1995 में हुआ था। पति का दावा था कि उसकी पत्नी पिछले 17 वर्षों से बिना किसी उचित कारण के उससे अलग रह रही है। उसने यह भी कहा कि उसकी पत्नी एक बिजनेस के जरिए हर महीने करीब 30000 रुपये कमाती है।

पति ने यह भी तर्क दिया कि उसके खिलाफ दर्ज दहेज उत्पीड़न के मामले में उसे बरी कर दिया गया था। साथ ही उसने अदालत को बताया कि वह आर्थिक तंगी का सामना कर रहा है और पत्नी व बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी निभाने के चलते उसकी वित्तीय स्थिति कमजोर हो गई है।

पति ने आगे अदालत को बताया कि साल 2003 में पारित एक आदेश के तहत उसकी पत्नी और दो नाबालिग बच्चों के लिए कुल 1600 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण राशि निर्धारित की गई थी। उसका कहना था कि वह लगातार इस राशि का भुगतान करता रहा है। लेकिन इसके बावजूद फैमिली कोर्ट ने गलत तरीके से उसकी पत्नी के पक्ष में मेंटेनेंस बढ़ाकर 5000 रुपये प्रतिमाह कर दिया और इसे आवेदन दाखिल किए जाने की तारीख से लागू कर दिया।

वहीं पति की याचिका का विरोध करते हुए पत्नी ने अदालत में कहा कि उसके पति ने उसे धोखा दिया और दूसरी शादी कर ली। जबकि उसने अपनी पहली पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी भी नहीं निभाई।

पति ने तर्क दिया कि वह निर्धारित मेंटेनेंस की रकम का लगातार भुगतान करता रहा है। लेकिन इसके बावजूद फैमिली कोर्ट ने गलत तरीके से उसकी पत्नी के पक्ष में मेंटेनेंस बढ़ाकर 5000 रुपये प्रतिमाह कर दिया और इसे आवेदन दाखिल करने की तारीख से लागू कर दिया।

वहीं, इस याचिका का विरोध करते हुए पत्नी ने अदालत में कहा कि उसके पति ने उसे धोखा दिया, दूसरी शादी कर ली और उसके भरण-पोषण की जिम्मेदारी भी नहीं निभाई।

पत्नी का कहना था कि बढ़ती महंगाई और जीवन-यापन की लागत में भारी वृद्धि के कारण उसने लगभग 11 वर्ष बाद मेंटेनेंस बढ़ाने के लिए आवेदन दाखिल किया था। उसने यह भी दलील दी कि परिस्थितियों में बदलाव के आधार पर भरण-पोषण राशि में संशोधन की मांग करने वाले आवेदन दाखिल करने के लिए कानून में कोई समय-सीमा (Limitation Period) निर्धारित नहीं की गई है।

मेंटेनेंस बढ़ाने के फैसले पर हाईकोर्ट की मुहर

फैमिली कोर्ट के आदेश की समीक्षा करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों बच्चे अब बालिग हो चुके हैं और इसलिए वे भरण-पोषण (मेंटेनेंस) पाने के हकदार नहीं रहे।

अदालत ने अपने आदेश में कहा, ”7 मार्च 2022 के विवादित आदेश के अवलोकन से स्पष्ट है कि दोनों पक्षों के बच्चे वयस्क हो चुके हैं और अब उन्हें मेंटेनेंस प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। इस तथ्य पर किसी भी पक्ष ने कोई आपत्ति नहीं जताई।”

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि मेंटेनेंस बढ़ाने का आवेदन, मूल आदेश पारित होने के एक दशक से ज्यादा समय बाद दायर किया गया था और इसका मुख्य आधार इस दौरान महंगाई में हुई भारी वृद्धि थी।

अदालत ने कहा, ”विपक्षी पक्ष संख्या-2 ने 28 मार्च 2024 को लगभग 11 वर्ष बाद, निर्धारित भरण-पोषण राशि बढ़ाने के लिए यह आवेदन दायर किया। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इन 11 सालों के दौरान महंगाई में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।”

अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद उन साक्ष्यों का भी संज्ञान लिया जिनसे पता चलता है कि पति मजदूरी का काम करता है और बढ़ी हुई भरण-पोषण राशि का भुगतान करने में आर्थिक रूप से सक्षम है।

अदालत ने कहा, ”रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों और दस्तावेजों से स्पष्ट है कि पुनरीक्षण याचिकाकर्ता मजदूर के रूप में कार्य करता है। इस संबंध में उसने अपनी आय प्रमाण पत्र की फोटोकॉपी भी पेश की है। इससे यह स्पष्ट होता है कि वह बढ़ी हुई भरण-पोषण राशि का भुगतान करने में पूरी तरह सक्षम है।”

हाईकोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि संबंधित महिला याचिकाकर्ता की पहली पत्नी है और उसका भरण-पोषण करना पति की प्राथमिक जिम्मेदारी है- खासकर तब जब पहले निर्धारित की गई राशि बढ़ती महंगाई और जीवन-यापन की बढ़ती लागत के कारण अपर्याप्त हो चुकी हो।

अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा, ”यह निर्विवाद तथ्य है कि विपक्षी पक्ष संख्या-2 पुनरीक्षण याचिकाकर्ता की पहली पत्नी है। इसलिए पत्नी का भरण-पोषण करना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है, विशेष रूप से तब जब पहले निर्धारित की गई मेंटेनेंस राशि महंगाई और बढ़ती जीवन-यापन लागत के मद्देनजर अब पर्याप्त नहीं रह गई है।”

इन्हीं तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट द्वारा भरण-पोषण (मेंटेनेंस) राशि को 1000 रुपये से बढ़ाकर 5000 रुपये प्रतिमाह किए जाने का आदेश पूरी तरह तर्कसंगत और न्यायोचित है। अदालत ने कहा कि इस आदेश में हस्तक्षेप करने की कोई जरूरत नहीं है।