सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि महिलाओं, विशेषकर बालिकाओं के खिलाफ भेदभाव देश के कई हिस्सों में व्यापक रूप से प्रचलित है और कन्या भ्रूण हत्या इस सामाजिक बुराई का एक क्रूर उदाहरण है।
मुकदमे को शुरू में ही समाप्त नहीं कर सकते
न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने गुरुग्राम के एक रेडियोलॉजिस्ट के खिलाफ गर्भाधान पूर्व एवं प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन निषेध) (पीसीपीएनडीटी) अधिनियम, 1994 के तहत दर्ज मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया और कहा कि वे उसके खिलाफ मुकदमे को शुरू में ही समाप्त नहीं कर सकते।
पीठ ने कहा, ‘देश के कई हिस्सों में आज भी बालिकाओं और महिलाओं के प्रति भेदभाव व्याप्त है। इस सामाजिक बुराई का क्रूर और घिनौना रूप कन्या भ्रूण हत्या के रूप में देखने को मिलता है। इस प्रकार के अपराध को अंजाम देने की दिशा में पहला कदम भ्रूण के लिंग का निर्धारण करना है।’
संबंधित रिकॉर्ड रखना अनिवार्य
पीठ ने कहा है कि संसद ने न केवल लिंग निर्धारण और चयन को गैरकानूनी घोषित किया है, बल्कि इससे संबंधित सभी गर्भाधान पूर्व और प्रसव पूर्व तकनीकों एवं प्रक्रियाओं पर भी रोक लगा दी है, और निर्धारित प्रारूप में संबंधित रिकॉर्ड रखना अनिवार्य कर दिया है।
पीठ ने कहा, ‘निर्धारित प्रारूप में रिकॉर्ड न रखना पीसीपीएनडीटी अधिनियम और नियमों के तहत अपराध होगा। जहां तक वर्तमान मामले का संबंध है, प्रथम दृष्टया यह रिकॉर्ड में आया है कि अपीलकर्ता ने गर्भवती महिला का अल्ट्रासोनोग्राफी कराया था।’ इसने कहा, ‘क्या उसने कानून के अनुसार आवश्यक रिकॉर्ड बनाए रखा है या नहीं, साथ ही भ्रूण के लिंग का खुलासा न करना, मुकदमे का विषय है। इसलिए, यह ऐसा मामला नहीं है जिसे मुकदमे की शुरुआत में ही रोक दिया जाए।’
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि गुरुग्राम के न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित मामले को रद्द नहीं किया जा सकता।
