केरल हाई कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न के एक मामले में महिला की सास को राहत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि बहू द्वारा सास पर लगाए गए आरोप स्पष्ट और गंभीर हैं, जिनकी सच्चाई का फैसला ट्रायल के दौरान सबूतों के आधार पर किया जाना चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने महिला के देवर के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को खारिज कर दिया, क्योंकि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप सामान्य और अस्पष्ट थे।
यह आदेश जस्टिस जॉबिन सेबेस्टियन ने महिला की सास और देवर की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए 7 अगस्त को दिया। दोनों ने अपने खिलाफ दर्ज दहेज उत्पीड़न से जुड़े आपराधिक मामले को रद्द करने की मांग की थी।
दहेज कम लाने पर बहू को सुनाती थी ‘चुभने वाली बातें’
अदालत ने सास पर लगाए गए आरोपों को ठोस माना। आदेश में कहा गया कि सास पर स्पष्ट आरोप है कि वह बहू को बार-बार यह कहकर ‘चुभने वाली बातें’ सुनाती थी कि शादी में उसके मायके से पर्याप्त दहेज नहीं आया है। कोर्ट के मुताबिक, इन आरोपों की सच्चाई या झूठ का फैसला ट्रायल कोर्ट में सबूतों की जांच के बाद ही किया जा सकता है।
मामले के अनुसार, महिला और आरोपी व्यक्ति की शादी सितंबर 2019 में हुई थी। शादी के बाद दोनों पति-पत्नी के रूप में साथ रह रहे थे। महिला का आरोप था कि उसके माता-पिता ने शादी के समय उसे करीब 55 सॉवरेन (लगभग 440 ग्राम) गहने दिए थे। आरोप है कि उसके पति ने ये गहने अपने कब्जे में लेने के बाद अपने भाई को सौंप दिए।
महिला ने यह भी आरोप लगाया कि उसकी सास लगातार उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित और अपमानित करती थी। सास कथित तौर पर शादी के समय मायके से लाए गए सोने के गहनों को बहुत कम बताकर उसे ताने देती थी।
मोबाइल से घटना रिकॉर्ड करने की कोशिश पर विवाद
महिला के मुताबिक, जनवरी 2020 में भी उसे अपमानित किया गया। जब उसने घटना को अपने मोबाइल फोन में रिकॉर्ड करने की कोशिश की, तो उसके देवर ने उसके साथ गाली-गलौज की और उसे थप्पड़ मारा।
महिला ने यह भी आरोप लगाया कि देवर ने उसे गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी। उसके अनुसार, देवर और सास दोनों ने उस पर उसके नाम की संपत्ति बेचने के लिए दबाव बनाया और धमकाया। इन घटनाओं के कारण वह मानसिक तनाव में चली गई।
देवर के खिलाफ आरोप क्यों खारिज हुए?
सास और देवर की ओर से पेश वकील पी. एंटो थॉमस ने दलील दी कि शिकायत में लगाए गए आरोप अस्पष्ट और सामान्य हैं। उन्होंने कहा कि आरोपों को पूरी तरह सही मान भी लिया जाए, तब भी याचिकाकर्ताओं के खिलाफ अपराध के जरूरी तत्व साबित नहीं होंगे।
वहीं, महिला की ओर से एडवोकेट विष्णु भुवनेन्द्रन ने दलील दी कि शिकायत और जांच के दौरान जुटाई गई सामग्री में दोनों आरोपियों के खिलाफ ठोस और स्पष्ट आरोप मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि ससुराल पक्ष द्वारा दहेज के संबंध में महिला के साथ दुर्व्यवहार और उत्पीड़न किए जाने के स्पष्ट आरोप हैं।
सास के खिलाफ केस चलेगा, देवर को मिली राहत
केरल हाई कोर्ट ने कहा कि आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत का दायरा सीमित होता है। इस स्तर पर यह देखा जाता है कि शिकायत और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को पहली नजर में पढ़ने पर अपराध के आवश्यक तत्व बनते हैं या नहीं।
कोर्ट ने कहा कि अगर आरोपों से ऐसे तथ्य संबंधी विवाद पैदा होते हैं जिनमें सबूतों की जांच और मूल्यांकन की जरूरत हो, तो ट्रायल कोर्ट को पूरी सुनवाई के बाद उन पर फैसला करना चाहिए।
अदालत ने पाया कि सास के खिलाफ लगाए गए आरोप स्पष्ट हैं और पहली नजर में क्रूरता तथा दहेज उत्पीड़न के अपराध के आवश्यक तत्वों को सामने लाते हैं। इसलिए उसके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया गया।
दूसरी ओर, देवर के खिलाफ लगाए गए आरोपों को अदालत ने ‘वाग और बेल्ड’ यानी अस्पष्ट और सामान्य माना। कोर्ट ने कहा कि केवल ऐसे आरोपों के आधार पर आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसी आधार पर देवर के खिलाफ चल रही कार्यवाही को खारिज कर दिया गया।
यह भी पढ़ें: ‘चंडीगढ़ में फैमिली कोर्ट न होना गंभीर मुद्दा’, हाई कोर्ट बोला- केंद्र और प्रशासन उठाएं जरूरी कदम
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने चंडीगढ़ प्रशासन को निर्देश दिया है कि वह चंडीगढ़ में जल्द से जल्द एक पारिवारिक न्यायालय (Family Court) की स्थापना के लिए पर्याप्त कदम उठाए। अदालत ने कहा कि जनहित याचिका (PIL) में फैमिली कोर्ट नहीं होने को लेकर उठाई गई शिकायत गंभीर मुद्दा है। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें।
