सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने शनिवार को कहा कि भारत में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या के लिए पूरी तरह से न्यायाधीशों को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने इसकी पीछे की वजह बताते हुए कहा कि न्याय वितरण प्रणाली (Justice Delivery System) में देरी अक्सर इस बात पर निर्भर करती है कि वकीलों द्वारा मामलों की पैरवी और संचालन कैसे किया जाता है।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा कि न्यायाधीशों के समक्ष प्रतिदिन सैकड़ों मामले सूचीबद्ध होते हैं। उन्होंने बताया कि निचली अदालत के स्तर पर, किसी भी न्यायाधीश के पास प्रतिदिन 400-500 से कम मामले नहीं होते। उन्होंने यह भी कहा कि उच्च न्यायालय में यह संख्या और भी ज्यादा है।

उन्होंने कहा, “बहुत सी बातें कही जाती हैं, लंबित मामले, न्यायाधीशों पर दबाव। मैं आपको उदाहरण देकर समझाता हूं कि न्यायाधीशों का लंबित मामलों या मुकदमों के ढेर से कोई लेना-देना नहीं है। एक न्यायाधीश को निश्चित समय के लिए बैठना पड़ता है। क्या किसी न्यायाधीश के न बैठने की शिकायत होती है? ऐसा बहुत कम होता है। “उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायाधीशों का यह कर्तव्य है कि वे उनके समक्ष प्रस्तुत सभी तर्कों को सुनें, भले ही वे दोहरावपूर्ण या लंबे प्रतीत हों।

अमानुल्लाह ने कहा कि एक न्यायाधीश के रूप में, क्या मैं किसी वकील को बहस करने से रोक सकता हूं? हां, मैं रोकता हूं। मैं उससे कहता हूं, ‘आप दोहरा नहीं सकते, आप समय बर्बाद कर रहे हैं।’ लेकिन क्या मैं उससे यह भी कहता हूं कि ‘आपमें बुद्धि नहीं है, आप बेतुकी बहस कर रहे हैं?’ मुझे नहीं पता, हो सकता है वह कुछ ऐसा कह दे जो बहुत प्रासंगिक हो। मुझे उसे वह स्थान देना होगा, ताकि वह अपने तरीके से अदालत को संबोधित कर सके। क्या न्यायाधीश जिम्मेदार है? शायद इसका उत्तर ‘नहीं’ होगा।”

उन्होंने आगे टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायाधीश और मामलों के निपटारे की दर के बीच बहुत कम संबंध है, और इस बात पर जोर दिया कि कार्यवाही की अवधि अक्सर वकीलों द्वारा निर्धारित की जाती है। उन्होंने विधि पेशे के भीतर आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया, विशेष रूप से उन प्रथाओं के संबंध में जो मुकदमेबाजी में देरी में योगदान करती हैं, जैसे कि लंबी बहस और स्थगन।

उन्होंने कहा कि किसी भी दृष्टिकोण से देखें, मूल रूप से यह इस बात पर निर्भर करता है कि अदालतों के पांच घंटे के कार्यअवधि में आप किसी व्यक्ति से कितना काम करवाने की उम्मीद करते हैं। न्यायाधीश और मामले के निपटारे की दर के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। यह वकीलों पर निर्भर करता है कि वे कितनी देर तक बहस करना चाहते हैं… आपको आत्ममंथन करना होगा। सिर्फ न्यायाधीशों को दोष न दें।

न्यायमूर्ति अमानुल्लाह, आईसीए के 5वें अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में बोल रहे थे। उन्होंने न्यायाधीशों से बौद्धिक रूप से सर्वोपरि होने की अपेक्षा करने के प्रति आगाह भी किया। जस्टिस ने कहा कि कभी भी किसी न्यायाधीश से यह अपेक्षा न करें कि वह प्रतिभाशाली हो और अपने क्षेत्र का विशेषज्ञ हो, क्योंकि तब वह आपकी बात नहीं सुनेगा। उसे निष्पक्ष और पारदर्शी होना चाहिए। इसलिए, प्रतिभा न्यायाधीश के लिए अनिवार्य नहीं है। अपने क्षेत्र में पूर्ण रूप से पारंगत होने पर वह किसी भी बात पर बहस की गुंजाइश नहीं छोड़ेगा।

जस्टिस वर्मा ने क्यों दिया इस्तीफा? इलाहाबाद हाई कोर्ट के सीनियर वकील ने बताई संभावित वजह

दिल्ली स्थित बंगले में कथित तौर पर बोरों में पड़े नोट जलने के मामले से विवाद में आए जस्टिस यशवंत वर्मा शुक्रवार को पद से इस्तीफा दे दिया। घटना के समय जस्टिस वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट में नियुक्त थे। विवाद के बाद उनका तबादला इलाहाबाद हाई कोर्ट हो गया था। सुप्रीम कोर्ट की समिति ने उनके खिलाफ जाँच की अनुशंसा की थी जिसके बाद जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया। संसदीय समिति द्वारा उनके खिलाफ जाँच पूरा करने से पहले ही जस्टिस वर्मा द्वारा इस्तीफा देने से मीडिया में अटकलों का बाजार गर्म हो गया। पढ़ें पूरी खबर।