डिजिटल अरेस्ट से जुड़े बढ़ते साइबर अपराधों पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की है। गृह मंत्रालय के तहत आने वाले भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) की ओर से दाखिल इस रिपोर्ट में दूरसंचार कंपनियों, बैंकों, और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय करने के साथ-साथ ठगी रोकने के लिए ठोस तकनीकी और कानूनी कदम सुझाए गए हैं।

यह रिपोर्ट अदालत के 9 फरवरी 2026 के निर्देशों के अनुपालन में पेश की गई जिसमें विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय (कॉर्डिनेशन) बढ़ाने, साइबर फ्रॉड की पहचान मजबूत करने और पीड़ितों के मुआवजे के ढांचे पर काम करने को कहा गया था।

सिम जारी करने पर कड़ी निगरानी

रिपोर्ट में सबसे अहम प्रस्ताव Biometric Identity Verification System (BIVS) को लागू करने का है। इसके तहत देशभर में एक व्यक्ति को जारी सभी सिम कार्ड को रियल-टाइम में ट्रैक करना संभव होगा। दूरसंचार विभाग को तीन महीने में नियम अधिसूचित करने को कहा गया है। छह महीने में तकनीकी सिस्टम लागू करने की योजना है। सरकार का लक्ष्य है कि दिसंबर 2026 तक पूरे देश में क्रॉस-ऑपरेटर सिम मॉनिटरिंग लागू हो जाए।

इसके अलावा, एक व्यक्ति द्वारा अलग-अलग कंपनियों से कई सिम लेने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए ‘प्राइमरी सिम से अनुमति’ का भी प्रस्ताव रखा गया है।

2-3 घंटे में संदिग्ध सिम ब्लॉक करने की तैयारी

डिजिटल अरेस्ट ठगी में सिम के त्वरित दुरुपयोग को देखते हुए रिपोर्ट में बड़ा सुझाव दिया गया है- संदिग्ध या फर्जी सिम को 2–3 घंटे के भीतर ब्लॉक करने की व्यवस्था हो। अभी यह प्रक्रिया लंबी होने से अपराधी शुरुआती घंटों में ठगी कर लेते हैं। कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने बताया कि ठगी वाली अधिकतर कॉल सिम एक्टिवेशन के शुरुआती घंटों में ही होती हैं, इसलिए त्वरित कार्रवाई जरूरी है।

टेलीकॉम कंपनियों और PoS एजेंटों की जवाबदेही तय

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि सिम जारी करने वाले प्वाइंट ऑफ सेल (PoS) एजेंटों की जिम्मेदारी सीधे टेलीकॉम कंपनियों पर होगी। फर्जी सिम जारी होने पर कंपनियों की जवाबदेही तय हो। PoS एजेंटों की पहचान और ट्रैकिंग मजबूत करने के निर्देश दिए हों। सिम सप्लाई चेन का पूरा डेटा डिजिटल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म पर अनिवार्य हो। इसके साथ ही कंपनियों को AI आधारित सिस्टम से संदिग्ध कॉल पैटर्न और सिम उपयोग की निगरानी बढ़ाने को कहा गया है।

व्हाट्सऐप पर शिकंजा

डिजिटल अरेस्ट ठगी में व्हाट्सऐप के दुरुपयोग को लेकर भी सख्त रुख अपनाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार व्हाट्सऐप ने कई अहम प्रतिबद्धताएं दी हैं।

-डिलीट अकाउंट का डेटा 180 दिन तक सुरक्षित रखना

-फर्जी डिवाइस ID को ब्लॉक करने की व्यवस्था विकसित करना

-पुलिस/CBI के लोगो का दुरुपयोग रोकने के लिए AI सिस्टम मजबूत करना

-संदिग्ध कॉल या मैसेज पर यूजर्स को अलर्ट देना

साथ ही ‘SIM binding’ फीचर लागू करने पर भी काम चल रहा है जिसे 4–6 महीने में लागू करने का दावा किया गया है।

10 करोड़ रुपये से अधिक मामलों में CBI जांच

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 10 करोड़ रुपये से अधिक की डिजिटल ठगी के मामलों को CBI को सौंपा गया है। गुजरात और दिल्ली के तीन मामलों की जांच CBI ने अपने हाथ में ली है। दिल्ली के एक मामले में 22.92 करोड़ रुपये की ठगी सामने आई और फिलहाल इसकी जांच जारी है। यह कदम बड़े साइबर नेटवर्क को तोड़ने के लिए अहम माना जा रहा है।

RBI का एक्शन प्लान

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी ठगी रोकने के लिए नई SOP तैयार की है।

-संदिग्ध खातों में तुरंत डिबिट फ्रीज लगाने का प्रावधान

-छोटे ग्राहकों के लिए मुआवजा ढांचा प्रस्तावित

-50,000 रुपये तक के फ्रॉड में आंशिक मुआवजे की योजना

इसके अलावा ‘मनी म्यूल’ खातों पर कार्रवाई के लिए PMLA की धारा 12AA लागू करने पर विचार चल रहा है।

पीड़ितों के मुआवजे और साझा जिम्मेदारी पर विचार

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि बैंकों, टेलीकॉम कंपनियों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की साझा जिम्मेदारी तय करने पर चर्चा जारी है। अंतरराष्ट्रीय मॉडल (सिंगापुर, यूरोप आदि) का अध्ययन किया जा रहा है और साइबर बीमा (Cyber Insurance) जैसे विकल्पों पर भी विचार हो रहा है।

डिजिटल अरेस्ट ठगी को ‘उभरता हुआ संगठित साइबर अपराध’ मानते हुए सरकार ने बहु-एजेंसी मॉडल अपनाया है।

टेलीकॉम, बैंकिंग और डिजिटल प्लेटफॉर्म- तीनों स्तरों पर एक साथ कार्रवाई की रणनीति तैयार की जा रही है। अब निगाह सुप्रीम कोर्ट के अगले निर्देशों पर है जो इन प्रस्तावों को लागू करने की दिशा तय करेंगे।