मद्रास हाईकोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के एक मामले की सुनवाई करते हुए अपने दोष सिद्धि के खिलाफ अपील दायर करने में एक व्यक्ति के 1000 से अधिक दिन की देरी को माफ कर दिया।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान संविधान के आर्टिकल 21 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला दिया और कहा, “याचिकाकर्ता को विधिक अपील पर योग्यता के आधार पर बहस करने का अवसर मिलना चाहिए।”
अपराधी को मिली थी दस साल की सजा
जस्टिस एन. माला की बेंच एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थीं जिसे एक स्पेशल कोर्ट ने साल 2022 में पॉक्सो एक्ट की धारा 6 (गंभीर भेदक यौन हमला) के साथ धारा 5 (j)(ii) (महिला बच्चे के मामले में, यौन उत्पीड़न के बाद बच्ची के प्रेग्नेंट होने के मामले में) 10 साल की सजा दी गई थी।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की, “यह अदालत याचिकाकर्ता को गुण-दोष के आधार पर वैधानिक अपील का मौका देती है और उसके 1108 दिनों की देरी को माफ करती है।” सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक पूर्व आदेश में कहा था कि किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है।
कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?
सुनवाई के दौरान मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार के तहत आर्टिकल 21, (जिसमें कहा गया कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा।) में अपील की जा सकती है।
विशेष कोर्ट ने पाया कि देरी के आधार पर उसके कारणों की जांच होनी चाहिए।
कोर्ट ने माना कि देरी से फाइल होने का आधार वित्तीय बोझ था और इस कारण याचिकाकर्ता को गुण-दोष के आधार पर वैधानिक अपील का मौका दिया गया।
याचिकाकर्ता को गुण-दोष के आधार पर 1108 दिनों के देरी के माफी दी जाती है और उसे अपील करने का मौका दिया जा रहा है।
क्या था मामला?
यह याचिका दोषी ने सितंबर 2022 के फैसले के खिलाफ अपील दायर करने में हुई देरी से दायर की थी। यह देरी वित्तीय दिक्कतों के कारण हुई और उसे क्रिमिनल अपील दायर करने के लिए वकील नहीं मिल रहे थे।
उसने सुनवाई के दौरान तर्क दिया कि यह देरी जानबूझकर नहीं किया गया और न ही किसी लापरवाही के कारण की गई।
अभियोजन पक्ष ने यह तर्क दिया कि याचिकाकर्ता पीड़िता और उसके परिवार को जानता था।
आरोप है कि उस व्यक्ति ने उसे नाबालिग लड़की का यौन उत्पीड़न किया, जो अक्सर उसके घर टीवी देखने जाया करती थी।
यह कथित घटना चार नवंबर 2018 को हुई थी, जिसके कारण पीड़िता ने 23 दिसंबर 2019 को एक बच्चे को जन्म दिया था। पॉक्सो एक्ट के अलावा, उस व्यक्ति पर आईपीसी की धारा 506 (आपराधिक धमकी) के तहत भी मामला दर्ज किया गया था। आरोपी को 21 सितंबर 2022 को दोषी ठहराया गया और 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई और उन पर दस हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया। आगे पढ़िए दीपम विवाद में हाई कोर्ट ने अधिकारियों को क्यों दी चेतावनी
