राखी बिष्ट ने 14 साल की मेहनत से अपना करियर बनाया था। मातृत्व अवकाश के बाद उन्हें उम्मीद थी कि वह उसी काम पर लौटेंगी। लेकिन जुलाई 2024 में HashiCorp में वापस आने पर उन्हें पता चला कि उनका पद किसी और को दे दिया गया है।

चार्टर्ड अकाउंटेंट बिष्ट ने जून 2022 में इस सॉफ्टवेयर कंपनी में अकाउंटिंग मैनेजर के तौर पर नौकरी शुरू की थी। उन्हें हर महीने 2.6 लाख रुपये वेतन मिलता था। दिसंबर 2023 में मातृत्व अवकाश लेने के बाद जब वह काम पर लौटीं तो उन्हें कंपनी के ट्रेजरी विभाग में भेज दिया गया। उन्हें जो काम दिया गया, वह आमतौर पर उनसे करीब तीन पद नीचे के स्टाफ अकाउंटेंट को दिया जाता था। ये काम ज्यादातर कागजी कार्रवाई और दफ्तर के सामान्य काम से जुड़े थे।

10 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश

बिष्ट ने अक्टूबर 2024 में इस्तीफा दे दिया और दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया। उन्होंने 50 लाख रुपये मुआवजे की मांग की और निजी कंपनियों के लिए सख्त भेदभाव-विरोधी दिशानिर्देश बनाने की भी मांग की। 31 अगस्त को हाई कोर्ट ने HashiCorp को बिष्ट को 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।

जस्टिस सचिन दत्ता ने अपने आदेश में कहा, ”किसी भी परिस्थिति में मातृत्व को वर्कप्लेस पर अपमान का कारण नहीं बनने दिया जा सकता।”

उन्होंने आगे कहा, ”संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 42 को साथ पढ़ने पर यह साफ है कि गर्भावस्था और मातृत्व को किसी महिला के करियर में नुकसान पहुंचाने, पद घटाने, उसकी पेशेवर स्थिति कम करने या करियर में आगे बढ़ने के अवसर रोकने का आधार नहीं बनाया जा सकता। ऐसे कदम ना केवल महिला कर्मचारियों को मिले कानूनी अधिकारों को कमजोर करते हैं बल्कि समानता, सम्मान, सामाजिक न्याय और काम की बेहतर परिस्थितियों के प्रति संविधान की प्रतिबद्धता को भी नुकसान पहुंचाते हैं।”

अपनी याचिका में बिष्ट ने अदालत को बताया कि उन्हें कहा गया था कि उनकी पुरानी टीम में उनके लिए कोई पद उपलब्ध नहीं है। उनके मुताबिक, नई भूमिका उस मैनेजरियल अकाउंटिंग पद से बिल्कुल अलग थी जिसके लिए उन्हें नौकरी पर रखा गया था। बिष्ट ने कहा कि ट्रेजरी विभाग में दी गई जिम्मेदारियों से उनकी योग्यता, अनुभव और पेशेवर स्थिति को नुकसान पहुंचा।

अदालत ने कहा कि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 और सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 में मातृत्व अवकाश के बाद महिला कर्मचारियों को दोबारा उनकी भूमिका में शामिल करने के लिए कोई बड़ी व्यवस्था स्पष्ट रूप से नहीं दी गई है।

अदालत ने कहा कि ऐसी स्पष्ट व्यवस्था नहीं होने से पहले से मौजूद संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा को सही तरीके से लागू करने में परेशानी हो सकती है। जस्टिस दत्ता ने कहा, ”कानून की ऐसी व्याख्या नहीं की जा सकती जिससे केवल औपचारिक या दिखावटी नियमों का पालन करके उसके वास्तविक अधिकारों को दरकिनार किया जा सके।”

‘मैटरनिटी लीव के बाद पद घटाना गलत’

अदालत ने कहा कि मातृत्व अवकाश के बाद काम पर लौटने वाली महिला को आमतौर पर उसी पद पर वापस रखा जाना चाहिए जिस पर वह मैटरनिटी लीव पर जाने से ठीक पहले काम कर रही थी।

जस्टिस दत्ता ने कहा, ”अगर किसी वास्तविक और स्पष्ट संगठनात्मक कारण से वह पद अब उपलब्ध नहीं है तो महिला को उसके जितना संभव हो सके उतने समान पद पर रखा जाना चाहिए।” इसमें वेतन, ग्रेड, पद की हैसियत, काम की प्रकृति, जिम्मेदारियां, प्रबंधकीय अधिकार और आगे बढ़ने के अवसर लगभग समान होने चाहिए।

उन्होंने कहा कि कंपनी को यह भी बताना होगा कि महिला का पुराना पद अब उपलब्ध क्यों नहीं है। इसके साथ ही उसे दिए जा रहे नए पद के बारे में पूरी जानकारी देनी होगी जिसमें उसका ग्रेड, वेतन, रिपोर्टिंग किसे करनी होगी और जिम्मेदारियां समेत सारी जानकारी शामिल हैं।

अगर महिला नए पद पर आपत्ति जताती है तो नियोक्ता को उसकी चिंताओं पर विचार करना होगा और अपने फैसले की वजह भी बतानी होगी।

अदालत ने HashiCorp को निर्देश दिया कि वह गर्भावस्था और मातृत्व से जुड़े कर्मचारियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए नियम या योजनाएं बनाए या जरूरी निर्देश जारी करे। हाल ही में IBM ने HashiCorp का अधिग्रहण किया है।

इन नियमों में गर्भावस्था के दौरान वर्कप्लेस पर जरूरी सुविधाएं, मातृत्व अवकाश के बाद महिला के पद और जिम्मेदारियों की सुरक्षा, स्तनपान के लिए सहायता, क्रेच की सुविधा, शिकायतों के निपटारे की समय-सीमा और शिकायत करने वाली महिला के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई से सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल होने चाहिए।

अदालत ने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया आज से छह महीने के भीतर पूरी करनी होगी। इसके अलावा, हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार के स्थायी वकील आशीष के. दीक्षित की ओर से दिए गए कुछ सुझावों पर भी गौर किया। इनमें प्रस्ताव दिया गया कि महिला कर्मचारियों के लिए एक ‘संरक्षित अवधि’ होनी चाहिए जो गर्भावस्था की जानकारी देने के समय से शुरू होकर काम पर लौटने के छह महीने बाद तक जारी रहे।

प्रस्तावित व्यवस्था के तहत, गर्भावस्था की जानकारी मिलने के सात दिनों के भीतर नियोक्ता को महिला की जरूरतों का अलग से आकलन करना होगा और उसे काम से छुट्टी पर भेजने या कम स्तर का पद देने के बजाय उचित कार्यस्थल सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी।

10 लाख रुपये के मुआवजे के अलावा, अदालत ने कंपनी को बिष्ट को 1.5 लाख रुपये मुकदमे के खर्च के तौर पर देने का भी निर्देश दिया। यह रकम दो महीने के भीतर चुकानी होगी।

तीसरी बार मां बनने वाली महिलाओं को अब मिलेगी 1 साल की छुट्टी, विजय सरकार का ऐलान

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली टीवीके सरकार ने मंगलवार को महिलाओं के लिए एक बड़ी घोषणा की कि राज्य सरकार तीसरी बार मां बनने वाली महिला कर्मचारियों के लिए मैटरनिटी लीव (मातृत्व अवकाश) की अवधि को 12 हफ्ते से बढ़ाकर 365 दिन यानी एक साल करेगी।

अभी सरकारी नौकरी करने वाली शादीशुदा महिलाओं को 365 दिन या एक साल की मैटरनिटी लीव मिलती है, जिनके एक बच्चे हैं, जबकि दो या उससे अधिक बच्चे होने पर उन्हें 12 हफ्ते तक की छुट्टी मिलती है।