सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को देश भर के निजी स्कूल शिक्षकों के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय कल्याण ढांचा (National Welfare Framework) तैयार करने की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार और राज्यों से जवाब मांगा है।

जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने ऑल इंडिया टीचर्स फेडरेशन की नेशनल कोऑर्डिनेटर लिगिमोल जॉर्ज की ओर से दायर याचिका पर केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी किया है।

याचिका में क्या मांग है?

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ता निजी स्कूलों में काम करने वाले शिक्षकों के लिए पूरे देश में एक समान और व्यापक वेलफेयर फ्रेमवर्क बनाने की मांग कर रही हैं। इसमें शिक्षकों की सामाजिक सुरक्षा और कल्याण से जुड़े उपाय शामिल किए जाने की मांग है।

याचिकाकर्ता ने न्यायालय में यह तर्क देते हुए याचिका दायर की कि निजी स्कूल के शिक्षक भारत के शिक्षण कार्यबल (India Teaching Workforce) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन उनके कल्याण के लिए कोई समर्पित राष्ट्रीय वैधानिक तंत्र मौजूद नहीं है।

अतः, राज्यों में कल्याणकारी उपायों के समन्वय और निगरानी के लिए एक राष्ट्रीय निजी स्कूल शिक्षक कल्याण बोर्ड या इसी तरह का कोई संस्थागत तंत्र स्थापित किया जाना चाहिए। इसको लेकर यह सुझाव दिया गया।

याचिका के अनुसार, कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम, ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम और सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 जैसे मौजूदा कानून निजी स्कूल शिक्षकों को पात्रता आवश्यकताओं और राज्य-विशिष्ट नियमों के आधार पर केवल सीमित या खंडित सुरक्षा प्रदान करते हैं।

याचिकाकर्ता ने समस्या की गंभीरता को उजागर करने के लिए UDISE+ 2023-24 के आंकड़ों का हवाला दिया। इन आंकड़ों के अनुसार, भारत भर में मान्यता प्राप्त निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में 37,30,047 शिक्षक कार्यरत हैं।

याचिका के अनुसार, कई निजी स्कूल शिक्षक संविदात्मक, अस्थायी, तदर्थ, निश्चित वेतन या वार्षिक रूप से नवीकरणीय नियुक्तियों पर काम करते हैं और सुनिश्चित पेंशन, पर्याप्त चिकित्सा सहायता, बीमा, दिव्यांगत सुरक्षा या अन्य सेवानिवृत्ति के बाद के लाभों के बिना सेवानिवृत्त होते हैं।

यह तर्क दिया गया कि एकसमान कल्याणकारी सुरक्षा के अभाव के परिणामस्वरूप राज्यों और संस्थानों में काफी हद तक समान कार्य करने वाले शिक्षकों के साथ एक जैसा व्यवहार नहीं होता है।

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