दिल्ली की राउज एवेन्यू ने हाल ही में आदित्य बिरला समूह की एल्युमीनियम और तांबा निर्माण कंपनी हिंडाल्को के खिलाफ सीबीआई द्वारा दर्ज किए गए एक दशक पुराने कोयला ब्लॉक आवंटन मामले को बंद कर दिया है।
राउज एवेन्यू कोर्ट के स्पेशल जज (पीसी एक्ट) धीरज मोर ने कंपनी के पूर्व अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ एसके तमोतिया और महाप्रबंधक (कॉर्पोरेट मामले) पीआरएस मणि के खिलाफ मामला भी बंद कर दिया।
सीबीआई नहीं पेश कर सकी पर्याप्त सबूत
बार एंड बेंच के मुताबिक, दिल्ली की कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सीबीआई अभियुक्तों द्वारा किए गए किसी भी कृत्य को अवैध साबित करने में विफल रही और केंद्रीय एजेंसी आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी या आपराधिक साजिश का प्रथम दृष्या मामला स्थापित नहीं कर सकी।
30 मई के अपने आदेश में कहा, “इसके अभाव में न तो रिकॉर्ड में कोई सबूत है और न ही कोई ऐसा उचित कारण है जिससे निष्कर्ष निकाला जा सके कि उन्होंने आपराधिक विश्वासघात या धोखाधड़ी समेत किसी भी अवैध कृत्य को अंजाम देने के लिए आपराधिक साजिश रची थी। इसलिए वे उक्त अपराध से बरी होने के हकदार हैं।”
कंपनी पर क्या लगा था आरोप?
कंपनी पर आरोप लगाया गया था कि हिंडाल्को ने ओडिशा में तलबीरा-I कोयला ब्लॉक के 1994 के आवंटन से जुड़ी शर्तो का उल्लंघन किया था, क्योंकि उसने प्रस्तावित बिजली परियोजनाओं के बजाय हीराकुड में अपने मौजूदा 67.5 मेगावाट के कैप्टिव पावर प्लांट में खदान से कोयले का उपयोग किया था।
यह आरोप लगाया गया था कि वर्ष 2004-05 से 2010-11 के दौरान कंपनी ने अपने अनुमानित कोयला भंडार लगभग 15 मिलियन टन से 4.80 मिलियन टन अधिक कोयला निकाला, जिससे अनुचित लाभ प्राप्त हुआ।
सीबीआई ने यह भी आरोप लगाया कि कंपनी के अधिकारियों ने संशोधित खनन योजना के मंजूरी मांगते समय कोयला मंत्रालय को गुमराह करने वाले बयान दिए थे।
सरकार और कंपनी के बीच प्रतिबंध पट्टे में शामिल नहीं था
हालांकि कोर्ट ने पाया कि मूल एलॉटमेंट लेटर में विवादित प्रतिबंध को 2003 में ओडिशा सरकार और कंपनी के बीच निष्पादित खनन पट्टे में शामिल नहीं किया गया था। कोर्ट ने यह माना कि कोयला ब्लॉक से संबंधित कानूनी अधिकार और दायित्व अलॉटमेंट पत्र के बजाय खनन पट्टे द्वारा नियंत्रित होते हैं।
जज धीरज मोर ने आगे कहा कि किसी भी तर्कसंगत कल्पना के दायरे में यह नहीं कहा जा सकता कि हिडाल्को के अधिकारियों द्वारा कथित तौर पर किए गए किसी भी गलत बयान ने सरकारी अधिकारियों को उन कार्यों को मंजूरी देने के लिए प्रेरित किया जिन्हें वे स्वीकार नहीं करते।
कोर्ट ने कहा, इस संबंध में लगाए गए आरोप भी निराधार हैं और खारिज किए जाने योग्य हैं, इसलिए इसने तीन आरोपियों को बरी कर दिया।
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