दिल्ली हाई कोर्ट ने यूट्यूबर गुलशन पाहुजा को अदालत की अवमानना को दोषी माना है। इसके साथ ही कोर्ट ने उनको छह महीने की जेल और 2,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। अदालत ने माना कि उन्होंने अपने वीडियो और कोर्ट में दलीलों के दौरान न्यायपालिका के खिलाफ आपत्तिजनक और विवादित टिप्पणियां की थीं।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, न्यायालय ने गौर किया कि पाहुजा ने अपने तर्कों में यह कहकर न्यायपालिका और तानाशाही की तुलना की है कि उन्हें भारतीय न्यायिक प्रणाली से न्याय की कोई उम्मीद नहीं है और यह आरोप लगाते हुए कि ‘अदालतों की मनमानी बढ़ती जा रही है और मैं कोई न्याय की उम्मीद नहीं कर रहा। यह भी कहा कि मनमर्जी का दूसरा अर्थ? तानाशाही होता है।

16 मई को पारित आदेश में जस्टिस नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर दुडेजा की खंडपीठ ने इस अपराध के लिए अधिकतम छह महीने की कारावास की सजा सुनाई, यह कहते हुए कि कम सजा उसे और अधिक प्रोत्साहित करेगी। इससे पहले, कोर्ट ने उन्हें अदालत की अवमानना ​​का दोषी पाया था और उसके बाद सजा सुनाने के संबंध में सुनवाई की थी।

विवादित वीडियो गुलशन पाहुजा ने अपने यूट्यूब चैनल “फाइट 4 ज्यूडिशियल रिफॉर्म्स” पर अपलोड किए थे। वीडियो में पहुजा को शिव नारायण शर्मा और दीपक सिंह नाम के वकीलों का इंटरव्यू लेते हुए देखा गया। आरोप है कि इंटरव्यू के दौरान वकीलों ने न्यायाधीशों और अदालतों के खिलाफ कुछ अपमानजनक टिप्पणियां कीं।

तीन न्यायिक अधिकारियों ने दिल्ली हाई कोर्ट को एक याचिका भेजकर अदालत की अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू करने की मांग करते हुए ऐसे वीडियो और बैनरों पर आपत्ति जताई थी। संबंधित वकीलों, शिव नारायण शर्मा और दीपक सिंह ने बिना शर्त माफी मांगी। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने इंटरव्यू को ऑनलाइन अपलोड करने की सहमति नहीं दी थी और उन्हें वीडियो के साथ पोस्ट किए गए आपत्तिजनक थंबनेल या बैनर के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। हाई कोर्ट ने उनकी माफी को सही पाया और उनके खिलाफ अवमानना ​​की कार्यवाही रद्द कर दी।

हालांकि, गुलशन पाहुजा ने अपनी टिप्पणियों को सही ठहराते हुए उन्हें न्यायिक सुधारों के लिए जनहित की वकालत और अदालती कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग के अभियान का हिस्सा बताया।

21 अप्रैल को सुनाए गए फैसले में अदालत ने उन्हें न्यायालय की अवमानना ​​का दोषी पाया था। इसके बाद उस पर लगाई जाने वाली सजा के संबंध में एक अलग सुनवाई हुई। सजा पर सुनवाई के दौरान, पहुजा ने एक बार फिर आपत्तिजनक टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि उन्हें भारतीय न्याय प्रणाली से न्याय की कोई उम्मीद नहीं है।

पाहुजा ने कहा कि अदालतों की मनमर्जी बढ़ती जा रही है और मैं कोई न्याय की उम्मीद नहीं कर रहा। उन्होंने अदालतों और तानाशाहों के बीच तुलना करते हुए कहा कि मनमर्जी का दूसरा अर्थ तानाशाही होता है।

उन्होंने अवमानना ​​की कार्यवाही के संचालन के तरीके पर भी आपत्ति जताई और कहा कि उनके द्वारा अपलोड किए गए वीडियो से संबंधित न्यायिक फाइलों को तलब नहीं किया गया, वीडियो में नामित न्यायिक अधिकारियों से गवाह के रूप में पूछताछ नहीं की गई और उन्हें उनसे जिरह करने का अवसर नहीं दिया गया।

न्यायालय ने पाया कि पाहुजा ने अपने आचरण के लिए कोई पश्चाताप नहीं दिखाया और न्यायिक प्रणाली के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियों को दोहराना जारी रखा। न्यायालय ने कहा कि अवमानना ​​करने वाले को अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है। वह सुधार के लिए कोई सुझाव भी नहीं देता। वास्तव में, वह कहता है कि उसने जो किया वह न्यायिक प्रणाली को सुधारने के इरादे से किया था। जैसा कि हमने उपरोक्त आदेश में उल्लेख किया है, वह वास्तव में इस न्यायालय के समक्ष और भी अपमानजनक दलीलें देकर अपनी अवमानना ​​को और भी गंभीर बना रहा है, और इस प्रकार स्पष्ट रूप से वह न तो पश्चाताप कर रहा है और न ही किसी दया का पात्र है।

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