दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को अतिरिक्त डीसीपी संदीप लांबा की निगरानी में पुलिस की ज्यादतियों के आरोपों से जुड़े 2025 के एक मामले को वापस लेने की याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। हाल ही में एक वीडियो में संदीप लांबा एक महिला को थप्पड़ मारते नजर आए थे। जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान 20 जुलाई को हुए पुलिस की कार्रवाई कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे, जिसमें से एक अतिरिक्त डीसीपी संदीप लांबा का वीडियो भी सामने आया था।
जस्टिस गिरीश कथपालिया ने मामले में सवाल उठाया कि क्या संदीप लांबा की प्रतिष्ठा को केवल ऐसे वीडियो के आधार पर धूमिल किया जाना चाहिए? आगे उन्होंने कहा कि बड़े प्रदर्शनों के दौरान अधिकतर लोग जमीनी हकीकतों के बारे में नहीं जानते।
वीडियो के कारण उसे बदनाम नहीं कर सकते- कोर्ट
बार एंड बेंच के मुताबिक जस्टिस गिरीश ने टिप्पणी की, “सिर्फ इसलिए कि वह एक वीडियो में कथित तौर पर एक महिला को थप्पड़ मारते हुए पकड़ा गया है, हम उसे बदनाम नहीं कर सकते। क्या हम जमीनी हकीकतों से वाकिफ हैं? भीड़ संसद में कैसे घुसती, गोलीबारी कैसे शुरू होती और कितने लोग मारे जाते?”
सीनियर सिटीजन महिला ने दायर की थी याचिका
हाई कोर्ट 68 वर्षीय एक सीनियर सिटीजन महिला की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, महिला ने दावा किया था कि पिछले साल रमजान के दौरान उसे जबरन उसके घर से निकाल दिया गया और पुलिस ने उसे एक रात के लिए अवैध रूप से हिरासत में रखा। याचिकाकर्ता ने कहा कि उसे संदीप लांबा की निष्पक्ष जांच करने की क्षमता पर भरोसा नहीं रहा।
उनकी याचिका में बताया गया कि जांच से पहले हाई कोर्ट ने स्वतंत्र जांच और उस पुलिस थाने के सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था जहां उन्हें हिरासत में रखा गया था। उन्होंने आगे आरोप लगाया कि संदीप लांबा ने उनका बयान दर्ज किए बिना ही एक सूचना जारी कर कहा था कि जांच बंद की जा रही है।
कोर्ट ने दिया था संदीप लांबा को यह निर्देश
घटनाक्रम के इस मोड़ के कारण याचिकाकर्ता ने संदीप लांबा के कम्यूनिकेशन नोट को चुनौती देते हुए याचिका दायर की। फलस्वरूप, कोर्ट ने संदीप लांबा को जांच समाप्त होने से पहले याचिकाकर्ता का बयान दर्ज करने का निर्देश दिया। इसके बाद, याचिकाकर्ता का बयान 13 जुलाई को दर्ज किया गया।
याचिकाकर्तान ने की थी मामला स्थानांतरित करने की मांग
हालांकि, याचिकाकर्ता को बाद में जंतर-मंतर प्रदर्शनों के दौरान संदीप लांबा की ओर से एक महिला प्रदर्शनकारी को थप्पड़ मारने की खबरें मिलीं। उन्होंने दलील दी कि इस तरह के आचरण से संदीप लांबा की निष्पक्षता पर उन्हें गंभीर संदेह हो रहा। इसलिए, उन्होंने अपनी शिकायत पर दर्ज मामले को किसी अन्य वरिष्ठ अधिकारी को स्थानांतरित करने की मांग की।
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता के वकील ने आगे कहा, “उसे वर्दी में दिनदहाड़े एक महिला को थप्पड़ मारते हुए देखा गया और उसके बाद प्रशासनिक कार्रवाई की गई है।”
वरिष्ठ नागरिक की ओर से पेश हुए वकील एम. सुफियान सिद्दीकी ने कहा,“पिछली घटनाओं और अन्य तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, याचिकाकर्ता के मन में पूर्वाग्रह की गंभीर आशंका उत्पन्न होती है। मेरा विनम्र निवेदन है कि इन परिस्थितियों को देखते हुए, जिनमें स्वयं जांच अधिकारी एक महिला के अधिकार का उल्लंघन करने का दोषी पाया गया है, कृपया इस बात पर विचार करें कि पीड़ित याचिकाकर्ता का बयान दर्ज किए बिना जांच को किस प्रकार बंद कर दिया गया।”
कोर्ट ने याचिका की खारिज
हालांकि, कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि हालिया आरोपों के कारण ही यह मान लेना उचित नहीं है कि संदीप लांबा को सौंपे गए हर मामले में वह पक्षपाती होंगे।
कोर्ट ने कहा, “विरोध करने का मौलिक अधिकार तो है, लेकिन यह संप्रभुता के केंद्र को नुकसान पहुंचाने तक विस्तारित नहीं होता। उन्होंने भीड़ से जिस तरह निपटा है भले ही यह शक्ति का दुरुपयोग ही क्यों न हो, उन्हें इस तरह कलंकित नहीं किया जा सकता। उन्हें निष्पक्ष सुनवाई और जांच का भी अधिकार है। क्या इसका मतलब यह है कि हर मामले में वे पक्षपाती होंगे? आपको बहुत निष्पक्ष होना होगा। संस्था को बदनाम करना बंद करें।”
इसी बीच, दिल्ली पुलिस ने अदालत को सूचित किया कि याचिकाकर्ता के मामले में जांच पूरी हो चुकी है और उसका बयान दर्ज कर लिया गया है। पुलिस ने आगे बताया कि संदीप लांबा ने जांच रिपोर्ट अंतिम निर्णय के लिए सक्षम प्राधिकारी को भेज दी है, जिसकी सूचना याचिकाकर्ता को दे दी जाएगी।
इस दलील पर ध्यान देते हुए, कोर्ट ने माना कि इस पर विचार के लिए कुछ भी नहीं बचा है। ऐसे में हाई कोर्ट ने कहा, “एएससी के बयान पर विचार करते हुए, याचिका निष्फल मानी जाती है और खारिज कर दी जाती है।”
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दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को चैटजीपीटी की संस्थापक ओपनएआई इंक के खिलाफ न्यूज एजेंसी एएनआई की ओर से दायर कॉपीराइट उल्लंघन के मुकदमे में अंतरिम निषेधाज्ञा आवेदन को खारिज कर दिया। जस्टिस अमित बंसल ने फैसला सुनाते हुए कहा कि उन्होंने क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र के मुद्दे पर एएनआई के पक्ष में फैसला सुनाया है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
