दिल्ली हाई कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान जामिया मिल्लिया इस्लामिया (JMI) से अलग-अलग कर्मचारियों के पदों की जानकारी देने को कहा है। यह निर्देश बुधवार को सुनवाई के दौरान दिया। याचिका में कहा कि केंद्रीय विश्वविद्यालय ने गैर-शिक्षण कर्मिचारियों की भर्ती का काम जिस निजी एजेंसी को दिया है, वह सिर्फ एक ही धर्म के लोगों की भर्ती कर रही है।

जामिया के ही एक कर्मचारी राम निवास सिंह ने यह याचिका दाखिल कर विश्वविद्यालय के 24 मार्च को जारी एक नोटिफिकेशन को चुनौती दी। नोटिफिकेशन में एक फर्म एवरेस्ट ह्यूमन रिसोर्स कंसल्टेंट्स के जरिए भर्ती किए गए 986 संविदा कर्मचारियों को नॉन टीचिंग स्टाफ के तौर पर काम जारी रखने की मंजूरी दी गई थी।

भर्ती में होता है भेदभाव

याचिका में दावा किया गया कि इन संविदा कर्मिचारियों में से एक बहुत बड़ी संख्या (720) एक खास समुदाय से आते हैं। साथ ही याचिकाकर्ता ने भी दावा किया कि भर्ती के दौरान भेदभाव किया जाता है।

राम निवास ने प्रणालीगत पूर्वाग्रह का आरोप लगाते हुए कोर्ट से जामिया को यह निर्देश देने की मांग की वह संविदा पर रखे गए कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए एक नई टेंडर प्रक्रिया शुरू करे और यह सुनिश्चित करे कि लोगों का चयन धर्म से प्रभावित न हो।

‘नियुक्त किए गए कर्मचारी एक विशेष समुदाय से आते हैं’

मामले पर सुनवाई मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की बेंच ने की। रामनिवास की ओर पेश हुए वकील अरुण भारद्वाज ने दलील दी कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया एक्ट,1988 और संविधान दोनों इस तरह के भेदभाव को रोकते हैं। जामिया एक आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से इन कर्मचारियों को नियुक्त करके अप्रत्यक्ष रूप से यह कर रहा है। हालांकि उन्होंने यह साफ किया कि वे स्वयं आउटसोर्सिंग के खिलाफ नहीं है, बल्कि इस बात के खिलाफ हैं कि आउटसोर्सिंग के जरिए नियुक्त किए गए कर्मचारी एक विशेष समुदाय से आते हैं।

वकील अरुण भारद्वाज ने जामिया का जिक्र करते हुए कहा, क्या आप किसी ऐसी एजेंसी को काम पर रख सकते हैं, जो वह काम करें जिसे पर सीधे तौर पर नहीं कर सकते।

भर्ती योग्यता के आधार पर होती है- जामिया

हालांकि जामिया की ओर से पेश हुए वकील प्रीतिश सभरवाल ने अरुण के तर्कों का खंडन किया और दलील दी, अगर कोई एजेंसी किसी भी समुदाय के लोगों को काम पर रखती है तो इससे आर्टिकल 16 का उल्लंघन नहीं होता क्यों यह एक धर्मनिरपेक्ष देश है और हर किसी को अधिकार है यहां तक की हाई कोर्ट में सफाई कर्मचारियों जैसे संविदा कर्मचारी होते हैं। हम यह नहीं कह सकते है किसी खास धर्म या क्षेत्र से हैं और इसलिए उन्हें हटाया जाना चाहिए।

सभरवाल ने आगे कहा, “अगर कोई दूसरा समुदाय आवेदन करता है, तो वह समुदाय (भेदभाव का आरोप लगाएगा)… लेकिन भर्ती पूरी तरह से योग्यता के आधार पर होती है…”

प्रीतिश सभरवाल ने आगे कहा, “अगर कोई दूसरा समुदाय आवेदन करता है, तो वह समुदाय भेदभाव का आरोप लगाएगा, लेकिन भर्ती पूरी तरह योग्यता के आधार पर होती है।”

1000 में से 990 लोग एक ही समुदाय से क्यों- मुख्य न्यायाधीश

जामिया के दलीलों से सहमत होते हुए मुख्य न्यायाधीश डी. के . उपाध्याय ने जामिया के वकील से कहा, “इन तथ्यों पर कोई विवाद नहीं है, लेकिन फिर यह क्या है? जिस एजेंसी को आप चुनते हैं, उसमें 1000 लोग हैं, जिनमें से 990 लोग एक खास समुदाय से आते हैं। क्या आउटसोर्सिंग एजेंसी को जामिया एक्ट के प्रावधानों का पालन करना होगा? फंड आपकी तरफ से आता है। क्या आपने उनसे समावेशिता बरतने को कहा था? क्या आपके टेंडर में ऐसा कोई क्लॉज था?”

कोर्ट ने आगे पूछा कि क्या 986 पद स्वीकृत थे और यूनिवर्सिटी में किस तरह के पद हैं- स्वीकृत या गैर-स्वीकृत- दैनिक मजदूरी के आधार पर कितने लोग काम कर रहे हैं और क्या संविदा के आधार पर की गई नियुक्तियां स्वीकृत पदों के लिए हैं या नहीं। इसकी विस्तृत जानकारी हमारे समक्ष लेकर आएं।

कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए जामिया को इस संबंध में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर को होगी।

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दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि स्वच्छ, इस्तेमाल करने योग्य और सम्मानजनक शौचालय (टॉयलेट) की सुविधा कर्मचारियों के बुनियादी कामकाजी अधिकारों का हिस्सा है। इसकी के साथ कोर्ट ने जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय द्वारा एक वरिष्ठ महिला प्रोफेसर के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को रद्द कर दिया। महिला प्रोफेसर ने यूनिवर्सिटी में साफ-सुथरे और ‘वेस्टर्न स्टाइल’ टॉयलेट की मांग की थी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें