Delhi High Court: दिल्ली उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विवाह वैध होने के बावजूद नाबालिग पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने पर दंडात्मक कानून से छूट या सुरक्षा नहीं मिल सकती।
उच्च न्यायालय ने कहा कि यदि कोई वयस्क व्यक्ति 18 साल से कम उम्र की लड़की से जुड़े मुकदमे में, केवल पर्सनल ला से मान्यता प्राप्त विवाह प्रमाण पत्र पेश करके बचने लगे, तो इससे यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (पाक्सो) कानून का उद्देश्य कमजोर हो जाएगा।
16 साल तीन महीने की लड़की
न्यायमूर्ति संजीव नरूला ने 23 सितंबर के आदेश में यह टिप्पणी की। अदालत ने यह टिप्पणी नाबालिग पत्नी के यौन उत्पीड़न के आरोपी एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने से इनकार करते हुए की। दोनों की शादी के समय लड़की की उम्र 16 साल तीन महीने थी और आरोपी व्यक्ति की उम्र 28 साल थी। इसके बाद दोनों साथ रहने लगे और लड़की गर्भवती हो गई।
सरकारी अस्पताल जाने की वजह से हुआ खुलासा
गर्भावस्था के दौरान सरकारी अस्पताल जाने पर उसकी उम्र का पता चला। जून में लड़की ने मृत बच्चे को जन्म दिया। अस्पताल प्रशासन की ओर से पुलिस को मामले की जानकारी दिए जाने के बाद व्यक्ति के खिलाफ पाक्सो अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया।
लड़की ने कहा था कि शादी दोनों परिवारों की सहमति से हुई थी और उसके साथ कोई जबरदस्ती नहीं की गई और न ही दबाव डाला गया। पहले उसने व्यक्ति की जमानत याचिका का समर्थन भी किया था और गर्भावस्था के दौरान उसकी मौजूदगी चाही थी।
आपराधिक जिम्मेदारी नहीं…
याचिका में दंपति ने दलील दी थी कि मुसलिम पर्सनल लॉ के अनुसार यौवनावस्था में पहुंचने के बाद मुस्लिम लड़की विवाह के योग्य होती है और विवाह वैध होने के कारण उसके बाद बने शारीरिक संबंधों के लिए आपराधिक जिम्मेदारी नहीं बनती।
हालांकि, अदालत ने कहा कि इस तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि मुसलिम पर्सनल ला के तहत हुआ विवाह, उसके बाद के यौन संबंधों को अपने आप आपराधिकता के दायरे से बाहर कर देता है।
डीआरडीओ के दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी नाबालिग पत्नी के यौन उत्पीड़न के आरोपी एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने से इनकार करते हुए की।
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