दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से संबंद्ध सभी कालेजों में हॉस्टल सुविधाओं के प्रावधान की मांग करने वाली एक जनहित याचिका (PIL) पर नोटिस जारी किया है। जिससे हॉस्टल और सुरक्षा का व्यापक मुद्दा न्यायिक जांच के दायरे में आ गया है।

छात्रों के लिए संस्थागत आवास की कमी और निजी तौर पर संचालित पेइंग गेस्ट (पीजी) आवासों से जुड़े जोखिमों को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच यह याचिका दायर की गई है। दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में पांच मंजिला पीजी इमारत के गिरने के बाद इस मुद्दे में तेजी आई है, जिसमें सात लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए।

जनहित याचिका में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रावासों की कमी को लेकर चिंता जताई गई है। जनहित याचिका में दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों में छात्रावास सुविधाओं की स्थापना और विस्तार के लिए निर्देश मांगे गए हैं। इसमें तर्क दिया गया है कि संस्थानों में सीमित आवास सुविधाओं के कारण बड़ी संख्या में छात्रों को निजी पीजी और छात्रावासों पर निर्भर रहना पड़ता है, जहां सुरक्षा मानकों की पर्याप्त निगरानी नहीं हो पाती है।

2.5 लाख छात्र, 9,000 बेड्स

यह मामला उन छात्रों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जो उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए देश के अन्य हिस्सों से दिल्ली आते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में 2.5 लाख से ज्यादा छात्र हैं, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा राष्ट्रीय राजधानी के बाहर से आता है।

हालांकि, विश्वविद्यालय की मौजूदा छात्रावास क्षमता लगभग 9,000 बेड्स के करीब है। जिससे बड़ी संख्या में छात्रों को अपने आवास की व्यवस्था स्वयं करनी पड़ती है। दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ ही कॉलेज वर्तमान में छात्रावास की सुविधा प्रदान करते हैं। परिणामस्वरूप, छात्र अक्सर निजी पीजी, किराए के फ्लैट और उत्तरी परिसर और दक्षिणी परिसर के आसपास स्थित छात्रावासों का सहारा लेते हैं।

सत्य निकेतन हादसे के बाद उठी आवाज

सत्य निकेतन हादसा ने छात्रों के आवास और सुरक्षा के मुद्दे को सामने ला दिया है। सत्य निकेतन में बिल्डिंग ढहने से दिल्ली में प्राइवेट हॉस्टल की सुरक्षा को लेकर चिंताएं फिर से बढ़ गई हैं। यह इलाका दिल्ली विश्वविद्यालय के कई कॉलेजों के करीब स्थित है और यहां बड़ी संख्या में छात्र रहते हैं जो निजी पीजी और किराए के मकानों पर निर्भर हैं।

इस हादसे ने छात्रों के आवास के लिए उपयोग किए जा रहे भवनों की संरचनात्मक सुरक्षा, अग्नि सुरक्षा तैयारियों और नियामक निरीक्षण के बारे में सवाल खड़े कर दिए हैं।

इस घटना के बाद दायर जनहित याचिका में छात्रों को सुरक्षित और किफायती आवास उपलब्ध कराने के लिए संस्थागत जिम्मेदारी बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। याचिका में तर्क दिया गया है कि छात्रावास सुविधाओं का विस्तार करने से छात्रों की अनियमित या अपर्याप्त निगरानी वाली निजी संपत्तियों पर निर्भरता कम हो सकती है।

दिल्ली सरकार ने पीजी और हॉस्टल आवासों के विनियमन को मजबूत करने की दिशा में भी कदम उठाए हैं। प्रस्तावित उपायों में कथित तौर पर पीजी के लिए अनिवार्य लाइसेंसिंग, पुलिस सत्यापन और मंजूरी, संरचनात्मक स्थिरता प्रमाण पत्र, अग्नि सुरक्षा प्रमाणन और छात्र आवास सुविधाओं का अनिवार्य पंजीकरण शामिल हैं। अधिकारी एक सार्वजनिक पोर्टल बनाने पर भी विचार कर रहे हैं जहां छात्र और अभिभावक पंजीकृत और अनुमोदित आवासों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकें।

इन उपायों से पारदर्शिता में सुधार होने और छात्रों के लिए निर्धारित सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने वाले आवास की पहचान करना आसान होने की उम्मीद है। सुरक्षित और किफायती छात्र आवास का व्यापक प्रश्न हालांकि सख्त नियमन से तात्कालिक सुरक्षा चिंताओं का समाधान हो सकता है।

लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष दायर जनहित याचिका एक व्यापक प्रश्न उठाती है? क्या दिल्ली का उच्च शिक्षा अवसंरचना शहर में आने वाले छात्रों की बढ़ती संख्या के साथ तालमेल बिठा पाया है। हजारों छात्रों के लिए, विशेषकर अन्य राज्यों और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के लिए, दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्ययन करने के दौरान आवास सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बना हुआ है। छात्रावास सुविधाओं की कमी अक्सर छात्रों को निजी किराये के आवासों की ओर धकेलती है, जहां किराया अधिक हो सकता है और सुरक्षा की स्थिति में काफी भिन्नता हो सकती है। इसलिए, याचिका में अस्थायी नियामक उपायों से ध्यान हटाकर संस्थागत आवास के विस्तार की व्यापक आवश्यकता पर ध्यान केंद्रित करने की मांग की गई है।

दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा जनहित याचिका पर नोटिस जारी करने का निर्णय राजधानी में छात्र आवास को लेकर चल रही बहस में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। सत्य निकेतन हादसे के बाद निजी पीजी की सुरक्षा को लेकर लगातार उठ रहे सवालों के बीच, यह मामला इस बात पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित कर सकता है कि क्या दिल्ली विश्वविद्यालय और उससे संबद्ध कॉलेजों को बढ़ती छात्र संख्या की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने छात्रावास ढांचे का पर्याप्त विस्तार करने की आवश्यकता है।

खड़गे परिवार के ट्रस्ट को जमीन आवंटन मामले की नहीं होगी जांच, हाई कोर्ट ने रद्द किया ट्रायल कोर्ट का फैसला

कर्नाटक हाई कोर्ट ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और उनके परिवार द्वारा संचालित ट्रस्ट को बेंगलुरु विकास प्राधिकरण की जमीन आवंटित किए जाने में कथित अनियमितताओं की जांच से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने आरोपों की जांच करने के लिए गठित स्पेशल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया है। यह मामला 8,001 वर्ग मीटर की बेशकीमती जमीन के आवंटन से जुड़ा है। पढ़ें पूरी खबर।