दिल्ली की एक अदालत ने बुधवार को आम आदमी पार्टी और उसके नेताओं सौरभ भारद्वाज और अंकुश नरांग को आदेश दिया कि वे भाजपा सांसद बांसुरी स्वराज से जुड़ा कथित मानहानिकारक (अपमानजनक) वीडियो हटा दें। अदालत ने यह भी कहा कि सौरभ भारद्वाज,अंकुश नरांग और आम आदमी पार्टी आगे से बांसुरी स्वराज के खिलाफ कोई भी ऐसा कंटेंट न तो प्रकाशित करें और न ही फैलाएं, जो मानहानिकारक हो। अदालत ने कहा कि अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता।

साकेत कोर्ट के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश गुरविंदर पाल सिंह, बांसुरी स्वराज द्वारा दायर किए गए सिविल मानहानि के मामले की सुनवाई कर रहे थे। इस याचिका में बांसुरी स्वराज ने वीडियो/सामग्री हटाने, आगे ऐसे कंटेंट पर रोक लगाने, हर्जाना दिलाने और सार्वजनिक माफी की मांग की थी।

अदालत ने अपने आदेश में कहा गया है, “भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत किसी जीवित व्यक्ति के प्रतिष्ठा के अधिकार को किसी अन्य व्यक्ति के बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की वेदी पर बलिदान नहीं किया जा सकता है और दोनों को सामंजस्यपूर्ण और संतुलित किया जाना चाहिए, क्योंकि किसी भी प्रकार का हर्जाना किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को हुए नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता है। इसमें इस बात पर जोर दिया गया है कि प्रतिष्ठा को हुए नुकसान की भरपाई हर्जाने से पर्याप्त रूप से नहीं की जा सकती है।

अदालत में वीडियो देखने सहित सभी सबूतों की जांच करने के बाद न्यायाधीश ने माना कि बांसुरी स्वराज ने प्रथम दृष्टया मामला साबित कर दिया है। अदालत ने कहा कि सामग्री “तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करती है और जनता को गुमराह करती है”। इसके अलावा इसका निरंतर प्रसार “अपरिहार्य प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का जोखिम पैदा करता है और सुविधा का संतुलन वादी के पक्ष में है”। इसमें दोहराया गया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उचित प्रतिबंधों के अधीन है, जिसमें मानहानि भी शामिल है।

इसमें यह भी कहा गया है कि यदि 48 घंटों के भीतर आदेश का पालन नहीं किया जाता है, तो बंसुरी स्वराज सामग्री को हटाने के लिए कोर्ट के आदेश के साथ सीधे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से संपर्क कर सकती हैं।

क्या है पूरा मामला?

इस विवाद की शुरुआत 19 अप्रैल 2026 को हुई एक राजनीतिक घटना से हुई है। जब सदन में संविधान संशोधन विधेयक 2026 के गिर जाने के विरोध में भाजपा नेताओं ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के आवास के बाहर एक जोरदार प्रदर्शन किया था। इस प्रदर्शन में नई दिल्ली से बीजेपी सांसद बांसुरी स्वराज और केंद्रीय मंत्री रक्षा खडसे समेत पार्टी के कई बड़े नेता शामिल हुए थे। हालात को काबू में करने के लिए दिल्ली पुलिस ने मौके पर पहुंचकर बांसुरी स्वराज, रक्षा खडसे और अन्य बीजेपी नेताओं को हिरासत में ले लिया था।

बांसुरी स्वराज ने कहा कि जब दिल्ली पुलिस उन्हें हिरासत में लेकर पुलिस बस की तरफ ले जा रही थी, तब उन्होंने एकजुटता और समर्थन दिखाने के लिए अपने साथ चल रहीं केंद्रीय मंत्री रक्षा खडसे का हाथ पकड़ लिया था। स्वराज ने कोर्ट में आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी और सौरभ भारद्वाज ने इस घटना के वीडियो को जानबूझकर गलत संदर्भ में पेश किया। उन्होंने आरोप लगाया कि AAP नेताओं ने सोशल मीडिया पर ‘भारतीय ड्रामा कंपनी / BJP ड्रामा कंपनी’ के शीर्षक से यह वीडियो प्रसारित किया। इतना ही नहीं, भ्रम फैलाने के लिए वीडियो फुटेज में हाथ पकड़ने वाली जगह पर एक ‘लाल घेरा’ बना दिया गया और उसके साथ कैप्शन में लिखा गया कि सांसद ने जानबूझकर पुलिस अधिकारी का हाथ पकड़ा।

यह वीडियो इंस्टाग्राम , एक्स (पूर्व में ट्विटर) और फेसबुक पर व्यापक रूप से साझा की गई थी और बाद में नारंग द्वारा इसे दोबारा पोस्ट किया गया। 21 अप्रैल को AAP द्वारा आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से इसे और अधिक प्रचारित किया गया।

बांसुरी स्वराज का तर्क

स्वराज ने तर्क दिया कि झूठी कहानी गढ़ने और उन्हें सार्वजनिक उपहास का पात्र बनाने के लिए वीडियो के साथ जानबूझकर छेड़छाड़ की गई थी। उन्होंने तर्क दिया कि प्रतिवादियों ने उन्हें राजनीतिक नाटक के लिए हिरासत में लिए जाने का नाटक करने वाली के रूप में गलत तरीके से चित्रित किया, जिससे एक सार्वजनिक प्रतिनिधि के रूप में उनकी विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा। याचिका में यह भी बताया गया कि वीडियो में नाबालिग सहित अन्य असंबद्ध क्लिप को अपमानजनक तरीके से शामिल किया गया था, जिससे कथित मानहानि और भी बढ़ गई।

आम आदमी पार्टी की तरफ से क्या कहा गया?

सौरभ भारद्वाज और आम आदमी पार्टी के वकील, अधिवक्ता ऋषिकेश कुमार ने अंतरिम राहत का विरोध करते हुए तर्क दिया कि 22 अप्रैल को देर से सामग्री प्राप्त होने के बाद उनके पास जवाब देने के लिए सीमित समय था। उन्होंने वीडियो की प्रामाणिकता पर सवाल उठाया, सुझाव दिया कि यह प्रथम दृष्टया मानहानिकारक नहीं है और दावा किया कि यह सामग्री अब कुछ प्लेटफार्मों पर दिखाई नहीं दे रही है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि इस स्तर पर निषेधाज्ञा जारी करना प्रभावी रूप से बिना सुनवाई के मामले का फैसला करने के बराबर होगा।

हालांकि, कोर्ट ने प्रतिवादियों को अपने लिखित बयान दाखिल करने के लिए 30 दिन और अंतरिम आवेदन पर जवाब देने के लिए 15 दिन का समय दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई 13 मई को होगी।

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