दिल्ली की एक अदालत ने उत्तर प्रदेश के कुंडा विधायक राजा भैया के खिलाफ मंगलवार को पुलिस द्वारा दायर की गई चार्जशीट पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया। कुंडा विधायक पर अपनी पत्नी के साथ कथित तौर पर क्रूरता करने का आरोप है।
अदालत ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि कथित अतीत की घटनाओं का अतिशयोक्तिपूर्व वर्णन शिकायतकर्ता के मामले में मदद नहीं कर सकता। आगे अदालत ने कहा, हाल के क्रूर आचरण वाले कृत्यों के अभाव में पुराने आरोपों को पुनर्जीवित करने के लिए क्रिमिनल लॉ का सहारा नहीं लिया जा सकता है।
अदालत ने की ये टिप्पणी
अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अश्विनी पंवार दिल्ली पुलिस की एक याचिका मामले की सुनवाई कर रहे थे। मजिस्ट्रेट ने कहा, “यह अदालत इस बात से सहमत नहीं है कि आईपीसी की धारा 498ए के तहत अपराध के जरूरी प्रथम दृष्टया प्रकट होते हैं और अदालत का यह भी मत है कि शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए आरोप समय सीमा से बाहर हैं।”
उन्होंने कहा कि कथित अपराध पर संज्ञान लेने का अब कोई औचित्य नहीं है।
‘2015 के बाद शारीरिक क्रूरता के कोई आरोप नहीं’
अदालत ने कहा, “एफआईआर पर गौर करने पर पता चलता है कि शारीरिक हिंसा और क्रूरता के स्पष्ट कृत्यों के मुख्य आरोप 2015 में घटी एक घटना के हैं। वास्तव में विवाह के वर्ष यानी 1995 से लेकर 2015 से पहले कथित हमले तक शारीरिक क्रूरता का कोई आरोप नहीं है।”
आगे अदालत ने यह भी कहा कि एफआईआर काफी समय के बाद मार्च 2025 में दिल्ली के सफदरजंग एनक्लेव पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई थी। अदालत ने कहा, रिकार्ड में मौजूद सामग्री से यह भी पता चलता है कि एफआईआर दर्ज होने से पहले, यानी 2017 से 2025 तक, दोनों पक्ष कई सालों से अलग-अलग रह रहे थे।”
मेडिकल में चोटों के इलाज का जिक्र नहीं
2015 में शारीरिक हिंसा के आरोपों पर अदालत ने कहा, पुलिस रिपोर्ट में दो डॉक्टरों के बयान दर्ज किए गए, जिन्होंने कहा कि कोई हमला नहीं हुआ था और यहां तक कि मेडिकल रिकॉर्ड में भी हमले से हुई चोटों के इलाज का जिक्र भी नहीं था।
आगे कहा गया कि 1995 और 2015 के बीच शारीरिक क्रूरता का कोई आरोप नहीं था और वर्तमान एफआईआर 2025 में दर्ज की गई, जब दोनों पक्ष एक-दूसरे को कई अन्य मामलों में कोर्ट में घसीट चुके हैं।
अदालत ने कहा, “हालांकि एफआईआर में मानसिक क्रूरता और निरंतर पीड़ा के आरोप हैं, लेकिन रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री एफआईआर दर्ज होने से ठीक पहले की अवधि में आरोपी की ओर से की गई किसी विशिष्ट क्रूरतापूर्ण घटना का खुलासा नहीं करता है।”
आगे अदालत ने कहा कि कानून के मुताबिक निरंतर क्रूर आचरण चाहे वह मानसिक हो या शारीरित होना चाहिए न कि अतीत की घटनाओं का असंबद्ध और निराधार प्रभाव। शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए आरोप पुराने हैं, ऐसे में निरंतर क्रूर आचरण के अभाव में उन्हें पुनर्जीवित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
ठोस सबूत नहीं दिए गए
अदालत ने कहा, “शिकायतकर्ता की ओर से शिकायत दर्ज करने में हुई देरी के संबंध में दिया गया जवाब भय और आघात के सामान्य दावों से संबंधित है। इसके समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं पेश किया गया, जो इस अदालत को भरोसे में ले सके और इसलिए शिकायत दर्ज करने में हुई देरी के लिए एक भी उचित स्पष्टीकरण नहीं है।”
अदालत में पेश की गई एक रिकार्डिंग पर मजिस्ट्रेट ने कहा, “रिकार्डिंग में कोई भी घटना उस समय की नहीं है जब कथित तौर पर हमला किया गया था। साथ ही बातचीत वैवाहिक कलह से जुड़ी है जिसके बारे में केवल शिकायतकर्ता को ही पता था कि इसे रिकार्ड किया जा रहा है।”
मामले पर संज्ञान लेने से इनकार करते हुए अदालत ने कहा कि क्रूर आचरण को साबित करने के वाले सबूतों के अभाव में पुराने आरोपों को दोबारा जिंदा करने के लिए क्रिमिनल लॉ का सहारा नहीं लिया जा सकता। इसके अतिरिक्त, कथित अतीत की घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने से शिकायतकर्ता को मामले में कोई मदद नहीं मिलेगी। आगे पढ़िए पूर्व मंत्री राजा भैया और उनकी साली को हाई कोर्ट का नोटिस, पत्नी भानवी सिंह को राहत
