दिल्ली की एक कोर्ट से शरजील इमाम को राहत मिली है। अदालत ने सोमवार को 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े एक मामले में शरजील इमाम को उनके भाई की शादी में शामिल होने के लिए 10 दिन की अंतरिम जमानत दी है।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर बाजपेयी शरजील इमाम द्वारा दायर अंतरिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। जिसमें उन्होंने इस महीने होने वाले विवाह समारोह में शामिल होने के लिए छह सप्ताह की मोहलत मांगी थी। अदालत ने 20 से 30 मार्च तक अंतरिम जमानत मंजूर कर दी।

इमाम उत्तरपूर्वी दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए दंगों से संबंधित मामले में आरोपी हैं। जिसमें 53 लोग मारे गए थे और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे।

यह अंतरिम जमानत सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस साल जनवरी में इमाम की नियमित जमानत याचिका खारिज किए जाने के महीनों बाद आई है। उस समय, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में इमाम और उनके साथी छात्र कार्यकर्ता उमर खालिद को जमानत देने से इनकार कर दिया था।

अपने 6 जनवरी के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुकदमे में देरी और लंबी कैद, सख्त गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में जमानत हासिल करने के लिए “तुरंत कानूनी हथियार” नहीं हो सकते।

अदालत ने कहा कि यद्यपि व्यक्तिगत स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन जब आरोपों में सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले गंभीर अपराध शामिल हों तो यह एकमात्र कारक नहीं हो सकती।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारी की पीठ ने खालिद और इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं, लेकिन मामले में पांच सह-आरोपियों को जमानत दे दी। जमानत पाने वालों में गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद शामिल हैं।

अदालत ने कहा कि “दोष के पदानुक्रम” के कारण खालिद और इमाम अन्य आरोपियों की तुलना में अलग स्थिति में थे। दोनों कार्यकर्ताओं ने इस मामले के सिलसिले में पांच साल से अधिक समय जेल में बिताया है।

नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 के विरोध प्रदर्शनों के दौरान फरवरी 2020 में दंगे भड़क उठे। जिसके कारण तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा के दौरान उत्तरपूर्वी दिल्ली के कुछ हिस्सों में सांप्रदायिक झड़पें हुईं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दोनों आरोपी एक साल बाद या मुकदमे में सभी संरक्षित गवाहों की जांच पूरी होने के बाद, जो भी पहले हो, जमानत के लिए फिर से आवेदन कर सकते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि मात्र समय बीत जाने से यूएपीए जैसे विशेष कानूनों के अंतर्गत आने वाले अपराधों के मामलों में जमानत स्वतः ही उचित नहीं ठहराई जा सकती। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायालयों को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत संवैधानिक सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित अपराधों से जुड़े कानूनों में जमानत की सख्त शर्तों के पीछे संसद के इरादे के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए।

जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कॉलेजियम सिस्टम की पारदर्शिता पर उठाए सवाल

जस्टिस दत्ता ने कहा कि कॉलेजियम की प्रक्रिया इतनी अपारदर्शी है कि कई बार जजों को भी ठीक से पता नहीं होता कि यह कैसे काम करती है और इसकी बैठकें कहां होती हैं। उन्होंने कहा कि आपको यह जानकर हैरानी होगी कि हमें न सिर्फ यह नहीं पता कि अंदर क्या चल रहा है, बल्कि कई बार यह भी नहीं पता होता कि कॉलेजियम की बैठक कहां हो रही है। पढ़ें पूरी खबर।