Maha Kumbh Stampede: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में महाकुंभ मेले में हुई भगदड़ में मारी गई एक महिला के पति के मुआवजे के दावे पर जल्द फैसला लेने का आदेश दिया है। कोर्ट ने जांच आयोग और कुंभ मेला प्राधिकरण को निर्देश दिया है कि वे इस दावे को 30 दिनों के भीतर अंतिम रूप दें। राज्य सरकार की यह मांग अदालत ने खारिज कर दी कि आयोग की अंतिम रिपोर्ट आने तक मुआवजे पर फैसला टाल दिया जाए।

हाई कोर्ट ने यह आदेश उदय प्रताप सिंह की ओर से दायर रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया। जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने कहा कि यदि आदेश का पालन नहीं किया गया तो अदालत इस मामले को गंभीरता से लेगी।

पिछले साल 6 जून को इलाहाबाद हाई कोर्ट की अवकाशकालीन पीठ ने भगदड़ में मारे गए लोगों के परिवारों को अनुग्रह राशि देने में हो रही देरी पर उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी। कोर्ट ने सरकार के रवैये को अस्वीकार्य बताया और कहा था कि यह नागरिकों की पीड़ा के प्रति उदासीनता को दिखाता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि जब सरकार मुआवजे की घोषणा कर देती है, तो उसका समय पर और सम्मान के साथ भुगतान करना सरकार का जरूरी कर्तव्य होता है।

इस साल 9 जनवरी को राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि जांच आयोग ने याचिकाकर्ता का बयान 17 दिसंबर 2025 को ही दर्ज कर लिया था। सरकार ने यह भी कहा कि भगदड़ में हुई मौत के मामले की जांच कुंभ मेला प्राधिकरण के साथ मिलकर की जा रही है।

राज्य सरकार ने कोर्ट में कहा कि जांच की समयसीमा इसलिए बढ़ाई गई, क्योंकि कई पीड़ितों के आश्रित और अभिभावक देर से आयोग के सामने पहुंचे थे और उनके बयान दर्ज किए जा रहे थे। सरकार के अनुसार, यह फैसला जनता के बड़े हित को ध्यान में रखकर लिया गया था। लेकिन अदालत मुआवजे के भुगतान में और देरी के पक्ष में नहीं थी। पीठ ने कहा कि भले ही 6 जून 2025 को अधिकारियों को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया गया था, फिर भी याचिकाकर्ता के मुआवजे के दावे पर जितनी जल्दी हो सके फैसला लेना जरूरी है।

इसके बाद अदालत ने जांच आयोग और कुंभ मेला प्राधिकरण दोनों को आदेश दिया कि वे 8 जनवरी के आदेश की तारीख से 30 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता के मुआवजे के दावे पर अंतिम फैसला लें।

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हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और मेला प्राधिकरण की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी को निर्देश दिया कि अगली सुनवाई 18 फरवरी तक अधिकारियों द्वारा लिया गया निर्णय अदालत में दाखिल किया जाए। अदालत ने साफ कहा कि यदि आदेश के पालन से जुड़ा हलफनामा दाखिल नहीं किया गया, तो वह इस मामले को गंभीरता से लेने के लिए मजबूर होगी।

अपने पहले के विस्तृत आदेश में अदालत ने गहरी चिंता जताई थी कि याचिकाकर्ता की पत्नी, जिनकी पसलियां कुचलने से घायल हुई थीं, उनका शव प्रयागराज के मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के मुर्दाघर से बिना ठीक से जांच और बिना पोस्टमार्टम रिपोर्ट के ही परिजनों को सौंप दिया गया था।

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