इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गाजियाबाद की एक सिविल अदालत के जज के खिलाफ सख्त टिप्पणी करते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है। यह मामला एक संपत्ति विवाद से जुड़ा था, जिसमें निचली अदालत ने एक किरायेदार को उस संपत्ति पर कब्जा और मालिकाना हक दे दिया था।
मामले की सुनवाई हाई कोर्ट की पीठ कर रही थी। जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति संदीप जैन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि निचली अदालत का यह फैसला गलत ही नहीं, बल्कि जानबूझकर किया गया गंभीर न्यायिक कदाचार है। अदालत ने निचली अदालत के इस फैसले को ‘दिनदहाड़े न्यायिक हत्या’ तक कह दिया।
हाई कोर्ट ने बताया कि ट्रायल कोर्ट ने जानबूझकर महत्वपूर्ण सबूतों को नजरअंदाज किया, जैसे उस महिला का मृत्यु प्रमाण पत्र, जिसके नाम पर संपत्ति थी। अदालत के मुताबिक, ऐसा करने का मकसद वादी (किरायेदार) को अनुचित फायदा पहुंचाना था, जो पूरी तरह निंदनीय है।
उच्च न्यायालय ने साफ कहा कि ट्रायल जज का व्यवहार निष्पक्ष नहीं था और या तो बाहरी दबाव में या फिर अपनी गंभीर अक्षमता के कारण उन्होंने यह फैसला दिया। इसी वजह से हाई कोर्ट ने गाजियाबाद सिविल कोर्ट के 13 मई 2025 के फैसले को रद्द कर दिया और फाइल मुख्य न्यायाधीश को भेजने का आदेश दिया, ताकि संबंधित जज के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई की जा सके।
पीठ ने कहा कि यह जानबूझकर की गई न्यायिक कदाचार का मामला है। जिससे न्यायाधीश की सत्यनिष्ठा पर संदेह पैदा होता है। यह मामला इस न्यायालय की अंतरात्मा को झकझोर देता है कि एक न्यायाधीश वादी को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए इस तरह कैसे कार्य कर सकता है… जिस तरह से कानून का खुलेआम उल्लंघन किया गया है और न्याय से वंचित किया गया है। यह दिनदहाड़े न्यायिक हत्या का मामला है।
निचली अदालत ने क्या कहा
सिविल जज ने इंद्र मोहन सचदेव द्वारा दायर एक आवेदन पर यह आदेश दिया था। जिसमें अदालत से गाजियाबाद नगर निगम को संपत्ति के स्वामी के रूप में उनका नाम दर्ज करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था। सचदेव ने अदालत में शिकायत दर्ज कराई थी कि निगम उनका नाम दर्ज नहीं कर रहा है, जबकि इससे पहले मई 2022 में एक अतिरिक्त सिविल जज की स्थानीय अदालत ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया था।
हालांकि, निगम ने कहा कि आवेदक (इंद्र मोहन सचदेव) ने तथ्यों को छुपाकर गलत आधार पर मुकदमा दायर किया है। निगम ने यह भी कहा कि संपत्ति विवादित है और उसके संपत्ति अभिलेखों में मुरागा खाना के रूप में पंजीकृत है। लेकिन सिविल जज ने 31 मई, 2022 के फैसले के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि निगम विवादित संपत्ति के कब्जेदार मालिक के रूप में सचदेव के 2022 के फैसले का पालन करने के लिए बाध्य था, और उस फैसले को किसी भी सक्षम अदालत द्वारा रद्द नहीं किया गया है।
निचली अदालत ने अपने फैसले में कहा कि नगर निगम जिस संपत्ति से टैक्स वसूल रहा था और जिसे सचदेव लगातार समय पर टैक्स देता आ रहा था, उस संपत्ति पर सचदेव के मालिक होने से निगम इनकार नहीं कर सकता। अदालत ने माना कि टैक्स लेना खुद इस बात का संकेत है कि निगम सचदेव को मालिक मानता रहा है। अदालत ने यह भी कहा कि निगम की ओर से जो कागज़ात पेश किए गए थे, वे सिर्फ फोटोकॉपी थे। उनके साथ कोई ठोस या मूल साक्ष्य नहीं दिया गया था। इसलिए उन्हें सबूत के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता और सभी दस्तावेज खारिज कर दिए गए। इस फैसले से असहमत होकर नगर निगम ने निचली अदालत के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
हाई कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ मकान का टैक्स भर देने से कोई व्यक्ति उस संपत्ति का मालिक नहीं बन जाता। इसी तरह, अगर किसी का नाम नगर निगम के रिकॉर्ड में मालिक के तौर पर दर्ज है, तो इससे भी अपने-आप मालिकाना हक साबित नहीं होता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर कोई व्यक्ति किसी मकान में किरायेदार के रूप में रहता है, तो वह बाद में यह दावा नहीं कर सकता कि लंबे समय से रहने के कारण वह उस मकान का मालिक बन गया है। किरायेदार की जिम्मेदारी होती है कि वह मकान खाली करके असली मालिक को सौंपे।
इसके अलावा हाई कोर्ट ने निचली अदालत की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने कानून और सबूतों को नजरअंदाज कर दिया और एक पहले से ही अमान्य (गलत) फैसले के आधार पर वादी के पक्ष में फैसला दे दिया। ऐसे गलत फैसले पर भरोसा करके राहत देना न तो समझदारी है और न ही कानून के अनुसार सही।
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इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने हाल ही में अपने एक ज्यूडिशियल ऑर्डर के दौरान गंभीर बात कही। उन्होंने कहा कि एक न्यायाधीश के लिए एक ही दिन में मामलों की एक लंबी सूची से निपटना कितना थका देने वाला हो सकता है। पढ़ें पूरी खबर।
