छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 2010 के ताडमेटला हमले में सभी 10 आरोपियों की रिहाई को बरकरार रखा है। इस हमले में माओवादियों ने 76 सुरक्षाकर्मियों की गोली मारकर हत्या कर दी थी और उनके हथियार लूट लिए थे। कोर्ट ने सबूतों की कमी, जांच में प्रक्रियात्मक खामियों और उचित संदेह से परे दोष सिद्ध करने में विफलता का हवाला दिया।

यह घटना दंतेवाड़ा जिले में सीआरपीएफ और स्थानीय पुलिस की तरफ से चलाए गए जॉइंट ऑपरेशन के दौरान घटी थी। 6 अप्रैल 2010 की सुबह, सीआरपीएफ की 62वीं बटालियन और स्थानीय पुलिसकर्मी चिंतलनार के पहाड़ी जंगल की ओर जा रहे थे, तभी सुकमा जिले के ताडमेटला गांव के जंगल में उन पर घात लगाकर हमला किया गया।

75 जवान और एक पुलिसकर्मी की कर दी गई थी हत्या

इस घटना में सीआरपीएफ के कुल 75 जवान और एक पुलिसकर्मी की हत्या कर दी गई और उनके हथियार लूट लिए गए। भागने से पहले माओवादियों ने टिफिन बम भी लगाए। इस घटना के बाद से 10 आरोपियों में से दो की मौत हो चुकी है। इनमें 19 साल का बरसे लखमा भी शामिल है।

2013 में, दंतेवाड़ा के एक सेशन कोर्ट ने आईपीसी की धारा 148, 120बी और 396 के तहत अपराधों के साथ-साथ शस्त्र अधिनियम की धारा 25 और 27 और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 3 और 5 के तहत सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। अदालत ने कहा कि हालांकि यह घटना बेहद दर्दनाक थी, लेकिन अभियोजन एजेंसियां ​​असली अपराधियों की पहचान स्थापित करने में सक्षम नहीं हो पाई हैं।

कोर्ट ने इन पांच बिंदुओं पर गौर किया

कोर्ट ने पांच प्रमुख मुद्दों की ओर ध्यान दिया। पहला, कोई प्रत्यक्ष प्रमाण/प्रत्यक्षदर्शी नहीं था और अभियोजन पक्ष का मामला परिस्थितिजन्य सबूतों पर आधारित है। दूसरा, इकबालिया बयान की पुष्टि स्वतंत्र साक्ष्यों से नहीं हुई थी। तीसरा, जब्त की गई विस्फोटक सामग्री, घटना स्थल से बरामद की गई थीं, न कि आरोपी के कब्जे से।

चौथा बिंदु यह था कि शस्त्र अधिनियम के तहत जरूरी अभियोजन स्वीकृति का कोई रिकॉर्ड नहीं था और न ही आरोपी की टेस्ट आईडेंटिफिकेशन परेड आयोजित की गई थी। आखिरी बिंदु यह था कि यद्यपि पुलिस गवाहों और अधिकारियों के बयानों से यह पुष्टि होती है कि सामग्री जब्त की गई थी, लेकिन वे विस्फोटकों को रखने, संभालने या इस्तेमाल करने में आरोपी की संलिप्तता को साबित नहीं कर सकते।

राज्य की तरफ से दायर की गई अपील को खारिज करते हुए मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा, “हमें यह देखकर बेहद खेद है कि इतने गंभीर मामले में, जिसमें बड़े पैमाने पर जानमाल का नुकसान हुआ और नेशनल सिक्योरिटी को गंभीर परिणाम भुगतने पड़े, अंततः इस तरह से निपटा गया कि आरोपियों के खिलाफ कोई भी कानूनी रूप से मान्य और विश्वसनीय सबूत पेश नहीं किया जा सका। परिणामस्वरूप, निचली अदालत को उन्हें बरी करने के लिए विवश होना पड़ा।”

इसमें आगे कहा गया है, “हालांकि 76 लोगों की मौत निसंदेह एक गहरी त्रासदी और राष्ट्रीय चिंता का विषय है, लेकिन आपराधिक न्यायशास्त्र में यह भी सर्वविदित है कि अपीलीय न्यायालय स्पष्ट, ठोस और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य के अभाव में दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रख सकता है, जो उचित संदेह से परे अपराध साबित करता हो।”

अदालत ने राज्य को यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया कि भविष्य में गंभीर अपराधों की सभी जांच, विशेष रूप से वे जिनमें बड़े पैमाने पर हताहत हुए हों या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हो, अत्यंत सावधानी और कानूनी प्रक्रियाओं का कड़ाई से पालन करते हुए की जाएं।

सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस

बॉम्बे हाई कोर्ट ने गुरुवार को 2018 के एक स्पेशल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। स्पेशल कोर्ट ने सोहराबुद्दीन शेख और तुलसीराम प्रजापति के कथित फर्जी मुठभेड़ और 2005-06 में शेख की पत्नी कौसर बी की हत्या के मामले में गुजरात, राजस्थान और आंध्र प्रदेश के 21 पुलिसकर्मियों सहित सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया गया था। पढ़ें पूरी खबर…