कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की मुश्किलें अब बढ़ती हुई नजर आ रही हैं। गुवाहाटी हाई कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि पवन खेड़ा से हिरासत में पूछताछ करना जरूरी है, ताकि उन व्यक्तियों का पता लगाया जा सके जिन्होंने उन्हें यह दावा करने के लिए फर्जी दस्तावेज उपलब्ध कराए थे कि असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी के पास तीन विदेशी पासपोर्ट और संयुक्त राज्य अमेरिका में एक कंपनी है।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस पार्थिवज्योति सैकिया ने गुवाहाटी में असम पुलिस की क्राइम ब्रांच द्वारा हाल ही में खेड़ा के खिलाफ दर्ज किए गए मामले में उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने टिप्पणी की कि अगर खेड़ा ने केवल मुख्यमंत्री के खिलाफ आरोप लगाए होते, तो इसे राजनीतिक बयानबाजी कहा जाता, लेकिन उन्होंने एक निर्दोष महिला को विवाद में घसीट लिया।
अदालत ने कहा कि रिनिकी भुइयां सरमा के पति राजनीति में हैं और असम के मुख्यमंत्री हैं। लेकिन रिनिकी भुइयां राजनीति में नहीं हैं। अगर खेड़ा ने राज्य की मुख्यमंत्री पर ये आरोप लगाए होते, तो मामला महज राजनीतिक बयानबाजी होता। लेकिन राजनीतिक लाभ उठाने के लिए खेड़ा ने एक निर्दोष महिला को इस विवाद में घसीटा है।
अदालत ने कहा कि यह मानहानि का एक साधारण मामला नहीं है, और यह भी कहा कि खेड़ा को अभी अपने दावों को साबित करना बाकी है। कोर्ट ने कहा कि खेड़ा ने अभी तक इस बात को निर्विवाद रूप से साबित नहीं किया है कि रिनिकी के पास तीन अन्य देशों के पासपोर्ट हैं। उन्होंने यह भी निर्विवाद रूप से साबित नहीं किया है कि उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका में एक कंपनी खोली थी और उसमें भारी मात्रा में धन का निवेश किया था।
पवन खेड़ा के खिलाफ हाल ही में मानहानि, जालसाजी और आपराधिक साजिश के आरोप में एक आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। यह मामला उनके हालिया दावों के बाद दर्ज किया गया था कि असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां के पास कई विदेशी पासपोर्ट और विदेशों में अघोषित संपत्तियां हैं।
खेड़ा के इस दावे पर ध्यान देते हुए कि दस्तावेज उनके सहयोगियों द्वारा उन्हें उपलब्ध कराए गए थे। अदालत ने आज कहा कि उनकी हिरासत में पूछताछ आवश्यक थी “यह पता लगाने के लिए कि वे सहयोगी कौन हैं… जिन्होंने उनके लिए वे दस्तावेज एकत्र किए थे और उन्होंने वे दस्तावेज कहां से एकत्र किए थे।
न्यायालय ने आगे कहा कि खेड़ा इस मामले में पुलिस जांच से बच रहे थे, जबकि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री प्रथम दृष्टया भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 339 (जाली दस्तावेजों का कब्ज़ा) के तहत अपराध करने का संकेत देती है।
अदालत ने कहा कि उपरोक्त आधारों पर, न्यायालय का मानना है कि याचिकाकर्ता पवन खेड़ा अग्रिम जमानत के विशेषाधिकार के पात्र नहीं हैं। इस लिहाज से उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज की जाती है।
असम पुलिस ने 7 अप्रैल को दिल्ली स्थित पवन खेड़ा के आवास पर गई थी, लेकिन वह वहां नहीं मिले थे। बाद में खेड़ा ने पारगमन अग्रिम जमानत के लिए तेलंगाना हाई कोर्ट का रुख किया। तेलंगाना हाई कोर्ट ने उन्हें 10 अप्रैल को एक सप्ताह की राहत दी, ताकि वे असम की अदालतों में अग्रिम जमानत के लिए अपील कर सकें।
15 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार द्वारा दायर अपील पर तेलंगाना हाई कोर्ट के 10 अप्रैल के आदेश पर रोक लगा दी। इसके बाद खेड़ा ने हाई कोर्ट के पारगमन जमानत आदेश पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाए गए एकतरफा रोक को चुनौती देते हुए एक आवेदन दायर किया। हालांकि, पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ने रोक हटाने से इनकार कर दिया और पारगमन जमानत की अवधि बढ़ाने से भी मना कर दिया और न्यायालय ने खेड़ा को गुवाहाटी उच्च न्यायालय में अपील करने के लिए कहा।
इसके बाद खेड़ा ने गुवाहाटी उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। गुवाहाटी उच्च न्यायालय में अपनी याचिका में खेड़ा ने तर्क दिया कि उनके खिलाफ आरोप एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सार्वजनिक और राजनीतिक संदर्भ में दिए गए बयानों से उत्पन्न हुए हैं। उन्होंने कहा कि आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के लिए उन्हीं बयानों की “चुनिंदा व्याख्या” की गई है।
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने आगे कहा कि एफआईआर “शिकायतकर्ता के गुप्त मकसद/राजनीतिक प्रतिशोध को पूरा करने” के लिए दर्ज की गई थी, जो असम के मुख्यमंत्री की पत्नी हैं। याचिका में कहा गया है, “एक प्रमुख राजनीतिक व्यक्ति और प्रवक्ता होने के नाते याचिकाकर्ता को उनके सार्वजनिक कर्तव्यों के निर्वहन में दिए गए बयानों के लिए निशाना बनाया गया है, और विवादित एफआईआर कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है, जिसका उद्देश्य उत्पीड़न और डराना-धमकाना तथा ऐसे गुप्त उद्देश्यों को आगे बढ़ाना है, विशेष रूप से शिकायतकर्ता के कहने पर, जो असम राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है।
खेड़ा ने यह भी दावा किया कि उन्होंने ये आरोप “पूछताछ के रूप में” लगाए थे और इसलिए फर्जी पासपोर्ट या संपत्ति दस्तावेजों के निर्माण में उनकी कोई भूमिका नहीं हो सकती।
दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को दिल्ली पुलिस को चेतावनी दी है। हाई कोर्ट ने कहा कि वह पिछले महीने पुलिस द्वारा छात्रों और कार्यकर्ताओं की कथित अवैध हिरासत और यातना के मामले में सीबीआई जांच का आदेश देगा। पढ़ें पूरी खबर।
