सीजेआई सूर्यकांत ने शनिवार को कहा कि अदालतें सिर्फ पर्यावरण के नाम पर हर विकास परियोजना को शक की नजर से नहीं देख सकतीं। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा किया जाएगा तो देश के विकास और लोगों की वैध जरूरतों में रुकावट आ सकती है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने यह बात पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह के सम्मान में दोबारा बनाए गए पुस्तकालय के उद्घाटन के दौरान कह रहे थे। जस्टिस कुलदीप सिंह को पर्यावरण संरक्षण से जुड़े उनके अहम फैसलों के कारण भारत का ‘ग्रीन जज’ भी कहा जाता है।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश ने यह भी बताया कि जिस समय जस्टिस कुलदीप सिंह ने अपने फैसले दिए थे और आज के समय में काफी फर्क है। उस समय पर्यावरण को लेकर जागरूकता कम थी, इसलिए उनके फैसलों का मकसद पर्यावरण की सुरक्षा को मजबूत करना था।

सीजेआई ने कहा कि इस कार्य के महत्व को समझने के लिए, हमें उस आर्थिक संदर्भ को याद रखना होगा जिसमें यह कार्य किया गया था। 90 के दशक के उत्तरार्ध और 80 के दशक में, भारत औद्योगीकरण और उदारीकरण के आक्रामक दौर में प्रवेश कर रहा था। न्यायपालिका को इस बात का वास्तविक भय था कि विकास और अवसंरचना नदियों, जंगलों और वायु की कीमत पर हासिल न हो। उस समय, पर्यावरण नियम अपेक्षाकृत नए थे। प्रभाव आकलन, सार्वजनिक सुनवाई, वैज्ञानिक आधारभूत मानक आज की तरह मजबूत नहीं थे। उस स्थिति में, अधिकार-आधारित मजबूत पर्यावरणीय न्यायशास्त्र न केवल स्वाभाविक था बल्कि आवश्यक भी था। इसने अनियंत्रित शोषण के विरुद्ध एक संतुलन का काम किया।

उन्होंने आगे कहा कि आज न्यायपालिका के पास प्रतिक्रियात्मक रवैया अपनाने का विकल्प नहीं है। सीजेआई ने कहा कि आज परिस्थिति काफी बदल चुकी है। भारत विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। हमारी जनसंख्या में तीव्र वृद्धि हुई है, आकांक्षाएं कई गुना बढ़ गई हैं। फिर भी प्राकृतिक संसाधनों की मात्रा लगभग उतनी ही है। आज के दौर में न्यायपालिका के सामने चुनौती थोड़ी अलग है। हम संकीर्ण सोच नहीं रख सकते जो हर परियोजना को संदेह की दृष्टि से देखे, न ही हम ऐसी आत्मसंतुष्ट सोच रख सकते हैं जो पर्यावरण संरक्षण को समझौता करने योग्य समझे। हमारा कार्य है कि हम केवल प्रतिक्रियात्मक मॉडल से हटकर एक अधिक परिपक्व पर्यावरण शासन मॉडल की ओर बढ़ें जो विकास की योजना में ही पर्यावरण संरक्षण को एकीकृत करे।

मुख्य न्यायाधीश कांत ने आगे कहा कि न्यायपालिका को पर्यावरण से संबंधित मामलों में संवैधानिक प्रहरी के रूप में कार्य करना जारी रखना चाहिए, लेकिन उसकी भूमिका नीतिगत विकल्पों को प्रतिस्थापित करने या कानून के ढांचे के भीतर अपनाई जा रही वैध विकास आकांक्षाओं में बाधा डालने की नहीं होनी चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश कांत ने आगे कहा कि इसलिए न्यायालयों के समक्ष कार्य सावधानीपूर्वक संवैधानिक संतुलन बनाए रखना है, यह सुनिश्चित करते हुए कि पर्यावरण कानूनों को गंभीरता से लागू किया जाए, साथ ही यह भी स्वीकार किया जाए कि सतत विकास संवैधानिक दृष्टिकोण का एक अभिन्न अंग बना रहे।

सूर्य कांत ने आगे कहा कि आज ध्यान केवल पर्यावरण को हुए नुकसान को दूर करने से हटकर इस बात पर केंद्रित हो रहा है कि विकास की योजना और कार्यान्वयन इस प्रकार किया जाए जिससे ऐसे नुकसान का जोखिम कम से कम हो।

उन्होंने कहा कि इस मायने में न्यायपालिका ने केवल यह कहने से आगे बढ़कर कि ‘यदि आप प्रदूषण फैलाते हैं तो आपको भुगतान करना होगा। यह भी पूछा है कि क्या आपने पहले चरण में ही प्रदूषण से बचने के लिए हर संभव प्रयास किया है। मुख्य न्यायाधीश कांत ने आगे कहा कि परियोजना प्रस्तावक पर सख्त अनुपालन प्रदर्शित करने का बोझ बढ़ता जा रहा है।उन्होंने आगे कहा कि आज हमारा काम नई प्रौद्योगिकियों और नए आर्थिक मॉडलों के संदर्भ में उस रूपरेखा को आगे बढ़ाना है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कानून वैज्ञानिक वास्तविकताओं से बहुत पीछे न रह जाए।

सुप्रीम कोर्ट का दिल्ली के 51 अस्पतालों को अवमानना नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दिल्ली के 51 अस्पतालों को अवमानना नोटिस जारी किया क्योंकि उन्होंने कमजोर तबके के लोगों के लिए कम-से-कम 10 फीसद ‘इनपेशेंट डिपार्टमेंट’ (आईपीडी) और 25 फीसद ओपीडी (आउटपेशेंट डिपार्टमेंट) को मुफ्त इलाज देने की शर्त का पालन नहीं किया। पढ़ें पूरी खबर।